
Mumbai , 12 अगस्त . हिंदी सिनेमा के पुराने दौर में फिल्मों की शूटिंग आज की तरह आसान नहीं थी. न बड़े स्टूडियो थे, न सुरक्षा के इंतजाम इतने मजबूत थे और न ही हर मुश्किल काम के लिए तकनीक मौजूद थी. कलाकारों को कई बार वही काम खुद करना पड़ता था, जो आज बॉडी डबल या ग्राफिक्स की मदद से किया जाता है. वैजयंतीमाला भी ऐसे ही दौर की Actress थीं. पर्दे पर वह जितनी खूबसूरत और आत्मविश्वासी दिखती थीं, पर्दे के पीछे उनका सफर उतना ही मेहनत और मुश्किलों से भरा था.
उनकी किताब ‘बॉन्डिंग… ए मेमॉयर’ में ऐसे कई किस्से मिलते हैं, जिनमें फिल्मों की चमक के पीछे छिपी परेशानियां सामने आती हैं.
वैजयंती माला का जन्म 13 अगस्त 1933 को मद्रास (अब चेन्नई) में हुआ था. उनका परिवार दक्षिण India की कला और संस्कृति से जुड़ा था. बचपन से ही उन्हें भरतनाट्यम की शिक्षा मिलने लगी. आगे चलकर नृत्य उनके जीवन की सबसे बड़ी पहचान बना.
फिल्मों में उनका आना भी दिलचस्प था. उन्होंने 1949 में तमिल फिल्म ‘वाझकाई’ से शुरुआत की. इसके बाद हिंदी सिनेमा में ‘बहार’ से उनका रास्ता खुला. कुछ ही सालों में वह बड़ी स्टार बन गईं. ‘नागिन’, ‘देवदास’, ‘New Delhi’, ‘नया दौर’, ‘मधुमती’, ‘साधना’, ‘गंगा जमना’, ‘संगम’, ‘ज्वेल थीफ’ और ‘आम्रपाली’ जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय अभिनेत्रियों में शामिल कर दिया.
वैजयंतीमाला ने भरतनाट्यम को फिल्मों में अभिनय का हिस्सा बनाया. उनके डांस और अभिनय ने उस समय की हीरोइन की तस्वीर बदल दी. वह गाने में शानदार नृत्य किया करती थीं. इसी वजह से वह हिंदी और दक्षिण भारतीय सिनेमा, दोनों में अलग पहचान बनाने में सफल रहीं.
फिल्मों के पीछे का काम हमेशा इतना खूबसूरत नहीं था. उनकी आत्मकथा ‘बॉन्डिंग… ए मेमॉयर’ में शूटिंग के दौरान हुए हादसों का भी जिक्र है. कश्मीर में तमिल फिल्म ‘थेन्निलावु’ की शूटिंग के दौरान डल झील में एक सीन फिल्माया जा रहा था. इसी दौरान वैजयंतीमाला पानी में गिर गईं और लगभग डूब ही गईं, कि तभी कैमरामैन ने पानी में छलांग लगाकर उन्हें बाहर निकाला. इसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा.
वैजयंतीमाला ने अपनी किताब में एक और हादसे का जिक्र किया. 1966 में रिलीज हुई फिल्म ‘सूरज’ की शूटिंग के दौरान वह लकड़ी से बने प्लेटफॉर्म पर डांस कर रही थीं. इसी दौरान लकड़ी से निकली एक कील उनके पैर में घुस गई. उन्हें तुरंत इलाज दिया गया.
वैजयंतीमाला फिल्मी करियर के साथ-साथ लगातार भरतनाट्यम से जुड़ी रहीं और विदेशों में भी भारतीय शास्त्रीय नृत्य का प्रदर्शन किया. 1969 में वह संयुक्त राष्ट्र की 20वीं वर्षगांठ के मानवाधिकार दिवस समारोह में प्रस्तुति देने वाली पहली भारतीय नृत्यांगना बनीं. बाद में वह राजनीति में भी आईं और 1984 तथा 1989 में Lok Sabha की सदस्य रहीं. 1993 में उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया गया.
सम्मानों की बात करें तो उन्हें 1968 में पद्म श्री मिला. उन्हें कई फिल्मफेयर और नृत्य से जुड़े बड़े सम्मान भी मिले. 2024 में India Government ने उन्हें देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया. President भवन में 9 मई 2024 को उन्हें यह सम्मान दिया गया.
–
पीके/एबीएम
Skip to content