जब बाल मन में ‘लक्ष्मण रेखा’ से बैठा डर, ‘सीता हरण’ अध्याय से जुड़ी रवींद्रनाथ टैगोर की वह कहानी

New Delhi, 6 मई . राजसी ठाट-बाट और शानो-शौकत वाला एक अमीर खानदान. बंगाल के सबसे बड़े शहर कोलकाता में उस ठाकुर खानदान का रुतबा था. दूर-दूर तक लोग इस परिवार की चर्चा किया करते थे. इसी खानदान में जब देवेंद्रनाथ ठाकुर और सारदा देवी की 14वीं संतान के रूप में बेटा आया, तो किसी ने नहीं सोचा था कि सारी दुनिया में एक दिन उसके नाम का डंका बजेगा. बात हो रही है रवींद्रनाथ टैगोर की.

7 मई 1861 को जोड़ासाको के महलनुमा घर में रवींद्रनाथ ने पहली बार दुनिया को अपनी आंखों से देखा. रवींद्रनाथ दौलतमंद पिता की 14वीं संतान थे और मां सारदा की तबीयत अक्सर खराब रहती थी. जाहिर है कि लालन-पालन नौकरों के हाथ हुआ था.

वह इतने नटखट थे कि घर के नौकर भी तंग आ चुके थे. रवींद्रनाथ की हरकतों को बांधने के लिए रामायण के ‘सीता हरण’ की कहानी सुनाई गई और उन्हें एक चौक से घेरा बनाकर उसके भीतर खड़ा कर दिया गया. उन्हें नौकर कहते थे कि अगर इस घेरे से बाहर निकले तो रावण उठाकर ले जाएगा. उस बाल मन पर उसका गहरा असर पड़ा.

उन्होंने बहुत बाद में अपने बचपन के बारे में लिखा, “हम नौकर शासन में जिए. हमारे मन को बिल्कुल जकड़ दिया गया था. हमारे नौकर श्याम ने लक्ष्मण रेखा से बाहर निकलने पर चेतावनी दी थी कि घेरे से बाहर निकलते ही बड़ी मुसीबत होगी. मैं मन ही मन उस विपत्ति से डरता रहा.”

उनके बचपन का एक किस्सा यह भी है कि स्कूल जाने की जिद पर एक टीचर ने उनकी जमकर पिटाई की थी. उस दौर में परिवार की परंपरा के अनुसार, छोटे बच्चों को घर पर पढ़ाने के लिए शिक्षक आया करते थे. लेकिन अपने बड़े भाई की तरह उन्होंने भी स्कूल जाने की जिद पकड़ ली. इस पर मास्टरजी ने जमकर पिटाई कर दी थी. इस बाल मन पर यह अजीब-सा अनुभव था. हालांकि, जब वे थोड़े बड़े हुए तो उनका दाखिला एक बड़े स्कूल में करा दिया गया. मगर मन नहीं लगने के कारण उन्होंने अनेक स्कूल बदल दिए थे.

एक तरीके से प्रकृति प्रेम और कविता साहित्य उनके खून में था. एक बार पिता के साथ हिमालय की यात्रा ने उसे और तराशा. 12 साल की उम्र में रवींद्र ने एक लंबी कविता ‘अभिलाषा’ लिखी, जो उस समय की ‘तत्व बोधिनी पत्रिका’ में छपी. 1875 में रवींद्र ने स्कूल जाना छोड़ दिया. 14 साल की उम्र में उन्होंने एक और कविता लिखी, जिसका नाम था ‘वन फूल’, जो 1,600 पंक्तियों की थी. यह कविता ‘ज्ञानांकुर’ पत्रिका में छपी. उसी उम्र में उन्होंने देशभक्ति की एक कविता लिखी, जिसने काफी सुर्खियां बंटोरी थी.

1880 के दौर में जब इंग्लैड से रवींद्र लौटकर आए थे, दिल का सूनापन साथ था. वे 17-16 साल की उम्र में अपने भाई के साथ इंग्लैड गए थे. रवींद्रनाथ टैगोर के प्रपौत्र सुप्रिय टैगोर ने एक इंटरव्यू में कहा, “जब रवींद्रनाथ सोलह-सत्रह साल के हुए तब मंझले दादा (रवींद्र के भाई) के साथ पढ़ने के लिए विलायत भेज दिया गया, शायद बैरिस्टर बनाने के लिए, लेकिन रवींद्रनाथ ने दूसरा रास्ता चुन लिया. वहां वे आयरिश संगीत सीखने लगे और बाद में वाल्मीकि प्रतिभा नृत्य नाट्य में उसी आयरिश संगीत का इस्तेमाल किया.”

India लौटने पर अकेलापन उनसे सहा नहीं जा रहा था. हालांकि, उस समय तन्हा रवींद्र ने उदास गीतों का एक संसार रच दिया, जो बाद में ‘संध्या संगीत’ के नाम से छपा. इसके अलावा, संगीत नाटक ‘वाल्मिकी प्रतिभा’ और ‘काल मृग’ रवींद्रनाथ की कलम से निकले. उन्होंने अट्ठारह साल की उम्र में गीति नाट्य ‘भग्न हृदय’ लिखा.

इसके बाद उन्होंने अपना पहला उपन्यास ‘छोटी रानी का हाट’ लिखा. इसे काफी लोकप्रियता मिली. बंगाल के साहित्य प्रेमियों के लिए उन्होंने ‘निर्झरेर स्वप्न भंग’ लिखी, जो कभी न भूलने वाली एक रचना बनी. इस तरह उनका लिखना तेज रफ्तार से जारी रहा.

टैगोर अपने जीवन में एक महान कवि, उपन्यासकार, नाटककार, संगीतकार, चित्रकार और शिक्षाविद् बने, जिन्होंने भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई. उन्हें 1913 में गीतांजलि के लिए नोबेल पुरस्कार मिला, जिससे वे एशिया के पहले नोबेल विजेता बने. टैगोर ने ‘जन गण मन’ और ‘आमार सोनार बांग्ला’ जैसे राष्ट्रगानों की रचना की और ‘रवींद्र संगीत’ की परंपरा स्थापित की.

अपने स्वतंत्र विचारों और रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए वह आज भी प्रेरणा स्रोत हैं. टैगोर भारतीय संस्कृति की अमर ज्योति हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को मार्ग दिखाती रहेगी.

डीसीएच/एबीएम