
Mumbai , 18 अगस्त . खय्याम हिंदी सिनेमा के उन संगीतकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने अपने संगीत में गहरी भावनाओं और शब्दों को जगह दी. उनकी धुनें सुनते हुए लगता है कि जैसे कहानी धीरे-धीरे सामने आ रही हो. ‘कभी कभी’, ‘उमराव जान’, ‘नूरी’, ‘बाजार’ और ‘त्रिशूल’ जैसी फिल्मों के गीत आज भी लोगों को याद हैं. लेकिन, इस मुकाम तक पहुंचने की उनकी राह बिल्कुल आसान नहीं थी.
संगीत का जुनून तो बचपन से था, लेकिन एक समय ऐसा आया, जब इसी संगीत से उन्हें कमाई नहीं हो रही थी. उन्हें पेट पालने और भविष्य को संभालने के लिए सेना में जाना पड़ा. हालांकि, वर्दी पहनने के बाद भी दिल में संगीत ही बसा रहा और करीब तीन साल बाद वह फिर उसी दुनिया में लौट आए.
खय्याम का असली नाम मोहम्मद जहूर खय्याम हाशमी था. उनका जन्म 18 फरवरी 1927 को पंजाब के राहों में हुआ था. बचपन से ही उनका मन पढ़ाई से ज्यादा संगीत और फिल्मों में लगता था. वह मशहूर Actor और गायक केएल सहगल से बहुत प्रभावित थे और उनकी तरह Actor और गायक बनना चाहते थे. संगीत के इसी जुनून में करीब 11 साल की उम्र में वह घर छोड़कर दिल्ली में अपने चाचा के पास चले गए. चाचा ने उनके शौक को समझा और उन्हें संगीत की शिक्षा दिलाई. उन्होंने पंडित अमरनाथ और हुस्नलाल-भगतराम से शास्त्रीय संगीत सीखा.
आगे चलकर खय्याम लाहौर पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात मशहूर पंजाबी संगीतकार गुलाम अहमद चिश्ती (चिश्ती बाबा) से हुई. खय्याम उनकी धुनों को बहुत ध्यान से सुनते थे. एक बार उन्होंने चिश्ती बाबा की बनाई धुन का वह हिस्सा भी दोहरा दिया, जिसे वह खुद भूल गए थे. उनकी संगीत समझ देखकर चिश्ती बाबा ने उन्हें अपना सहायक बना लिया. लेकिन यहां एक बड़ी परेशानी थी. खय्याम को इस काम के लिए नियमित पैसे नहीं मिलते थे. वह गायकों और संगीतकारों की रिहर्सल में मदद करते थे और बदले में उन्हें खाना और रहने की जगह मिलती थी.
कुछ समय बाद खय्याम को महसूस हुआ कि इस तरह बिना कमाई के वह अपना जीवन नहीं चला पाएंगे. इसी आर्थिक मजबूरी ने उन्हें सेना में जाने का फैसला करने पर मजबूर किया. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वह ब्रिटिश इंडियन आर्मी में शामिल हुए और करीब तीन साल तक सेना में रहे. उनकी पोस्टिंग लाहौर, रावलपिंडी और पुणे में रही. सेना में भी वह अपने साथियों और अधिकारियों के लिए गाते थे. एक इंटरव्यू में खय्याम ने बताया था कि खास मौकों पर उनके अधिकारी उन्हें गाने के लिए बुलाया करते थे.
करीब तीन साल बाद खय्याम ने सेना छोड़ दी और फिर संगीत की दुनिया में लौट आए. वह दोबारा चिश्ती बाबा के पास पहुंचे. उनकी मेहनत को देखते हुए फिल्मकार बीआर चोपड़ा ने भी चिश्ती बाबा से कहा कि खय्याम को दूसरे सहायकों की तरह मेहनताना मिलना चाहिए. इसके बाद उन्हें 125 रुपए महीने की तनख्वाह मिलने लगी.
Mumbai पहुंचने के बाद खय्याम ने रहमान वर्मा के साथ मिलकर संगीतकार जोड़ी बनाई. दोनों ने ‘शर्माजी-वर्माजी’ नाम से काम किया और 1948 की फिल्म ‘हीर रांझा’ से संगीतकार के तौर पर शुरुआत की. बाद में रहमान वर्मा Pakistan चले गए और खय्याम ने अकेले काम करना शुरू किया. ‘बीवी’ के गीत ‘अकेले में वो घबराते तो होंगे’ और 1953 की फिल्म ‘फुटपाथ’ के ‘शाम-ए-गम की कसम’ ने उन्हें पहचान दिलाई. इसके बाद उनकी असली पहचान एक ऐसे संगीतकार की बनी, जो गीतों में कविता और भावनाओं को खास जगह देता था.
इसके बाद खय्याम ने ‘फिर सुबह होगी’, ‘कभी कभी’, ‘नूरी’, ‘त्रिशूल’, ‘थोड़ी सी बेवफाई’, ‘उमराव जान’, ‘रजिया सुल्तान’ और ‘बाजार’ जैसी फिल्मों में यादगार संगीत दिया. ‘उमराव जान’ के संगीत ने तो उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तक पहुंचाया. उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार, संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड और कई दूसरे सम्मान भी मिले. वर्ष 2011 में उन्हें India के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से नवाजा गया.
19 अगस्त 2019 को Mumbai में 92 साल की उम्र में खय्याम का निधन हो गया.
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पीके/एबीएम
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