भारतीय शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा, देश में लगभग 1.1 लाख स्कूल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे

नई दिल्ली (New Delhi) . यूनेस्को की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पूर्वोत्तर और ‘आकांक्षी जिलों’ में शिक्षकों के काम करने की स्थिति खराब है.ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों के बीच बुनियादी सुविधाओं के साथ ही सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) संबंधी ढांचे को लेकर असमानता है.रिपोर्ट में कहा गया है कि शिक्षकों की उपलब्धता में सुधार हुआ है, लेकिन माध्यमिक विद्यालयों में छात्र-शिक्षक अनुपात अब भी अच्छा नहीं है.भारत में लगभग 1.1 लाख स्कूल एक शिक्षक पर चल रहे हैं. देश में स्कूलों में कुल 19 प्रतिशत या 11.16 लाख शिक्षण पद रिक्त हैं, जिनमें से 69 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि छात्रों की मौजूदा संख्या को देखकर शिक्षण कार्यबल में 10 लाख से अधिक शिक्षकों की कमी है तथा प्रारंभिक बचपन की शिक्षा, विशेष शिक्षा, शारीरिक शिक्षा, संगीत, कला और व्यावसायिक शिक्षा जैसे विषयों तथा कुछ शिक्षा स्तरों पर शिक्षकों की कमी को देखकर इसकी आवश्यकता बढ़ने का अनुमान है. इसमें कहा गया है कि 15 वर्षों में मौजूदा कार्यबल के लगभग 30 प्रतिशत हिस्से को बदलने की जरूरत होगी. रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों में योग्य शिक्षकों की उपलब्धता और नियुक्ति दोनों में सुधार करने की आवश्यकता है. बुनियादी सुविधाओं के मामले में, पूर्वोत्तर और आकांक्षी जिलों में शिक्षकों के काम करने की स्थिति खराब है.

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश (Uttar Pradesh) (3.3 लाख), बिहार (Bihar) (2.2 लाख) और पश्चिम बंगाल (West Bengal) (1.1 लाख) में 1 लाख से अधिक पद खाली है.मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) में एक टीचर के सहारे चलने वाले स्कूलों की संख्या सर्वाधिक (21,077) है. अधिकांश खाली पद ग्रामीण स्कूलों में हैं. बिहार (Bihar) के मामले में 89 प्रतिशत गांवों में 2.2 लाख शिक्षकों की आवश्यकता है. इसी तरह यूपी में खाली पड़े 3.2 लाख पदों में से 80 फीसदी ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में हैं. बंगाल के लिए यह आंकड़ा 69 प्रतिशत है.रिपोर्ट में कहा गया है कि निजी स्कूल के शिक्षक और बच्चों के शिक्षक अत्यधिक कमजोर समूह हैं तथा उनमें से कई कम वेतन पर बिना किसी अनुबंध के काम करते हैं और उन्हें स्वास्थ्य या मातृत्व अवकाश का लाभ भी नहीं मिलता. रिपोर्ट में शिक्षकों के लिए और अधिक ‘पेशेवर स्वायत्तता’ पर बल देते हुए कहा गया है, ‘सार्वजनिक धारणा के विपरीत, शिक्षकों पर काफी कार्यभार है.

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