
New Delhi, 15 जुलाई . राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) की अध्यक्ष विजया रहाटकर ने Patna हाई कोर्ट के एक फैसले पर प्रतिक्रिया दी है.
उन्होंने कहा कि यौन अपराधों की व्याख्या करते समय केवल शारीरिक कृत्य को ही आधार नहीं बनाया जाना चाहिए. पीड़िता की गरिमा, उसकी सहमति, उसके मन में उत्पन्न भय और घटना से हुए मानसिक आघात को भी समान महत्व मिलना चाहिए.
उन्होंने कहा कि न्याय का उद्देश्य केवल कानून की तकनीकी व्याख्या तक सीमित नहीं हो सकता. यदि न्याय की प्रक्रिया पीड़िता के अनुभव और कानून की मूल भावना से दूर हो जाए तो न्याय व्यवस्था के प्रति समाज का विश्वास प्रभावित होना स्वाभाविक है.
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ने कहा कि निस्संदेह ही न्यायालय कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देते हैं लेकिन यदि किसी पीड़िता को 18 वर्षों की लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद भी पूर्ण न्याय न मिले और गंभीर यौन अपराधों में दोषियों को प्रभावी दंड न मिले, तो इससे महिलाओं के आत्मविश्वास और न्याय व्यवस्था पर उनके विश्वास को ठेस पहुंचती है.
उन्होंने कहा कि महिलाओं की गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हमारी न्याय व्यवस्था की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए. इस संदर्भ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा अपनाए गए स्पष्ट, संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण का मैं स्वागत करती हूं. मुझे विश्वास है कि हमारी न्याय व्यवस्था निरंतर महिलाओं की गरिमा और अधिकारों की रक्षा करते हुए अधिक संवेदनशील व पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण को और मजबूत करेगी.
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एमएस/
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