बिना शिक्षकों के स्कूल-!-विश्व गुरु बनने का पहला कदम!

(लेखक/ -डॉक्टर (doctor) अरविन्द प्रेमचंद जैन)
मध्य प्रदेश सरकार का यह मत हैं की आजकल छात्र (student) छात्राएं अभिमन्यु जैसी गर्भ से ही शिक्षित पैदा होती हैं और मोबाइल, लेपटॉप युग के कारण अब कोई शिक्षाकी जरुरत नहीं हैं इसलिए बिना शिक्षकों के अध्ययन अध्यापन किया जा सकता हैं इसीलिए रिक्त स्थानों को भरने की जरुरत भी नहीं हैं. इससे कई फायदे हैं. जैसे बिना पढ़े लिखे लोग रोजगार कार्यालय में पंजीकृत नहीं होंगे. दूसरे उनको घर से बाहर पढ़ने, नौकरी करने की जरुरत नहीं होगी, सब अपढ़ बच्चे अपने माँ बाप के पास रहेंगे और सरकार पर भार नहीं होंगे.
शिक्षा तंत्र भी चार स्तम्भ पर आधारित हैं —1शिक्षक, 2पुस्तकें संसाधन 3 छात्र, 4भवन
पर शिक्षा तंत्र में मंत्री, सचिव संचालक, होना अनिवार्य हैं प्राचार्य शिक्षक न हो तो भी शिक्षा का लक्ष्य पूरा हो जाता हैं. जिसके आधार पर हमारी बुनियाद रखी जाती हैं वह बिना नींव के हैं और हम कितनी भी बड़ी से बड़ी बात करले, सपने संजोले, सब्जबाग दिखालो सब झूठे होंगे.
जिस प्रकार कोरोना काल में कृतिम, आभासी माध्यमों से पढाई लिखाई का नाटक मात्र पैसा वसूली के लिए किया जा रहा था और किया जा रहा हैं उससे कोई भी संतुष्ट होगा. जिसका ज्वलंत उदहारण माननीय राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, मुख्य मंत्री गवर्नर, मंत्री अफसर बेचारे जो जीवंत संपर्क करना चाहते थे उन्हें आभासी दुनिया में रहकर अपना काम करना पड़ रहा हैं. उनसे पूछो बिना जानता जनार्दन के दर्शन बिना कैसा जीवन बीत रहा हैं. शायद कोई न कोई अवसाद ग्रस्त न हो गए हो.
इस मायने में बिना स्कूल और शिक्षकों के बेचारे बच्चों का दोहन तो नहो रहा हैं. इस बहाने राज्य सरकार (State government) पर वित्त का बोझ नहीं रह रहा, कारण वेतन नहीं देना पड़ रहा, भवन की जरुरत नहीं, छात्र (student) स्वंत्रत भारत के स्वतंत्र नागरिक, माँ बाप को कोई चिंता नहीं. उम्र बढ़ेगी फिर इससे कोई फरक नहीं पड़ता की उनके बच्चों की शादी अवश्य होगी और वे भी बिना पढ़े माँ बाप के औलाद पैदा करने योग्य हैं. बस पढ़े लिखे और बिना पढ़े लिखे माँ बाप बच्चे तो वैसे ही पैदा करते हैं. जिस प्रकार गांव या शहर या महानगर में रूपया की वही समान इज्जत होती हैं इसमें कोई भेदभाव नहीं हैं.
वैसे शहर और गांव के अभिभावक अधिकतर मूढ़ होते हैं, मुर्ख नहीं. हमारी मनपसंद सरकार बातें करने और कराने में बहुत निपुण हैं, स्वप्रशंसा और पर निंदा से भर पूर हैं. असली में वर्तमान सरकार के जितने भी मंत्री, विधायक, अफसर इस पीड़ा से मुक्त हैं उन्हें अपनी चिंता नहीं हैं और उनकी नयी पीढ़ी के लिए कान्वेंट और विदेश दूर नहीं हैं और गांव शहरों की चिंता चुनाव के समय होती हैं. आज एक विधायक का पद रिक्त हो जाता हैं तो दिन रात चिंतन मनन चलता रहता हैं क्योकि विधान सभा में बहुमत का सवाल होता हैं पर जिनसे देश का भविष्य बनना हैं उनके प्रति लापरवाह हैं. इस आधार पर हम विश्व गुरु की संभावना तलाश रहे हैं. यह कदम वैसा ही हैं जैसे बैल से दूध निकालना हो.
शराब की दुकाने खुलवाने सरकार तत्पर हैं उसका कारण आमदनी, अभी वैश्यालय खोलना हो तो सब सुविधायुक्त अनुकूल व्यवस्था हो जाएँगी, अभी बार रूम की मांग उठेगी तत्काल बात मानली जाएँगी पर अस्पताल, स्कूल ये खर्चीले विभाग हैं इन पर ध्यान नहीं जाता. हां अभी कोई योजना करोड़ों अरबों की हो उस पर तत्काल व्यवस्था बनती हैं,
एक बात ध्यान रखना होगा जब तक कोई राष्ट्र में शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था समुचित नहीं होगी वह उन्नत नहीं होगा. हां हम ऊपर से अच्छे दिखेंगे पर हमारा एक्स रे खोखला होगा. हम सब बातें बहुत ऊँची करते हैं, सब्जबाग दिखाते हैं पर धरातल में सब शून्य.
यह बात साफ़ इशारा कर रही हैं की 15 साल में तीन गुना (guna) बढे सरकारी स्कूल लेकिन 26 हज़ार 977 टीचर्स के पद खाली हैं. अंग्रेजी के 6994, गणित के 7883, केमिस्ट्री के 3497, विज्ञान के 1972 फिजिक्स के 757
प्राचार्य हायर सेकेंडरी –1800, प्राचार्य हाई स्कूल 1643, व्याख्याता — 3057, उच्च श्रेणी शिक्षक 20277 और एडजस्टमेंट के बाद खाली 5908 ==26385
हमारे देश में राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, गवर्नर, मुख्य मंत्री मुख्य न्यायाधीश (judge) और अन्य संवैधानिक पद एक मिनिट के लिए रिक्त नहीं रह सकते पर जिनसे बुनियाद तैयार होती हैं उनके प्रति हम कितने उदासीन रहते हैं. यह स्थिति अमूमन हर विभाग में हैं.
हम ऊपर से कितने स्वस्थ्य रहे एक्स रे हमारा खोखला हम ऊपर से कितने विद्वान् रहे बोलने से मुर्ख दिखलाई देंगे हम कितनी गरीबी मिटायेंगे गरीब सिर्फ मिटेगा मुखिया दिन में तीन बार पोशाक बदले गरीब की लंगोटी अच्छी नहीं लगती खुद एक रोटी के साथ भरपूर सलाद मिठाई खाये अपराध नहीं गरीब का चूल्हा जलता नहीं सुहाता फ़िक्र मत करो यह मात्र अस्थाई व्यवस्था हैं तुम्हारी श्मशान में दोनों को एक सा जलना और वैसी ही राख रहना चिंता करो, चिंतन नहीं.

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