गलियों के पेड़ का उस इलाके के लोगों का दैनिक जीवन में मूड बेहतर करने से है पर्याप्त संबंध


शहरी पेड़ों का होता है डिप्रेशन पर रोचक प्रभाव, शोधकर्ताओं ने किया एंटी डिप्रेसैंट नुस्खों का आंकलन

नई दिल्ली (New Delhi) . पेड़ों के अगिनत फायदे होते हैं. इस सूची में शायद अब डिप्रेशन या निराशा से उबरना भी शामिल हो जाएगा. जर्मनी के लाइपसिग के 9751 निवासियों पर हुए अध्ययन से इस तरह के पक्के संकेत मिले हैं. मानसिक स्वास्थ्य को असर करने का काम दूसरी तरह के कारक भी कर सकते हैं लेकिन आंकड़े बताते हैं कि गलियों के पेड़ का उस इलाके के लोगों का दैनिक जीवन में मूड बेहतर करने में पर्याप्त संबंध है.

समुदायों के मानसिक स्वास्थ्य को सही तरह से जानने के लिए शोधकर्ताओं ने लोगों की ओर से दी गई जानकारी के बजाय एंटी डिप्रेसैंट नुस्खों का आंकलन किया. इसके बाद उन्होंने लोगों के इलाके में गलियों में पड़ों की संख्या के आकड़ों से तुलना की. शोध में पाया गया कि लोगों के घर से सौ मीटर के अंदर स्थानीय वनस्पति का एंटी डिप्रेसैंट नुस्खा लेने की संभावना कम होने से संबंध है. शोधकर्ताओं का कहना है कि यह पड़ताल शहरी नियोजनकर्ता, स्वास्थ्य व्यवसायी और सरकार के लिए बहुत उपयोगी साबित होगी. गलियों के पेड़ों का एंटीडिप्रैसेंट लेने की कमी का खास तौर पर सामाजिक आर्थिक रूप पिछड़े वर्ग समूह में ज्यादा नाता दिखाई दिया.

वैसे इन नतीजों पर ही निर्भर नहीं रहा जा सकता. लेकिन ये यह संकेत तो देते ही हैं कि शहरी पेड़ सामान्य तौर पर मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाने का आसान और किफायती तरीके के तौर पर उपयोगी हो सकते हैं. इसके अलावा वे समाज में स्वास्थ्य असामानता को कम करने में सहायक हो सकते हैं. यूके में डी मोंटफोर्ट यूनिवर्सिटी की पर्यावरण मनोवैज्ञानिक मेलीसा मर्सेले का कहना है, हमारी पड़ताल सुझाती हैं कि शहरी की गलियों के पेड़, जो लोगों की पहुंच के दायरे में हों, आर्थिक रूप से अलग अलग समाजिक समूहों में स्वास्थ्य असमानता के अंतर को कम करने में मदद कर सकते हैं. यह एक अच्छी खबर है क्यों कि ऐसे पेड़ों तक पहुंचना आसान है और उनके संख्या भी बिना किसी खास नियोजन के बढ़ाई जा सकती है.

जब शोधकर्ताओं ने डिप्रेशन के जोखिमों को कम करने के दूसरे कारक देखे जैसे कि रोजगार, लिंग, आयु, और वजन जैसे दूसरे कारक देखे तो सामाजिक आर्थिक रूप से अलाभकारी समूहों के बाहर गलियों के पेड़ों का कारक केवल मामूली तौर पर प्रभावी था. इससे उन्हें यह पता चला कि जिन लोगों को डिप्रेशन के मामले में सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वे ज्यादातर प्रकृतिक वातावरण से हासिल कर लेते हैं. शोधकर्ताओं ने पाया कि 100 मीटर की दूरी बहुत अहम थी. आसपास की गलियों के इलाके में ज्यादा पेड़ों के होने से एंटीडिप्रैसेंट नुस्खों की दर पर ज्यादा असर नहीं पड़ा. वहीं शोधकर्ताओं ने यह भी पाया की पेड़ों की प्रजाति भी मायने नहीं रखती. जहां इस अध्ययन की अपनी सीमाएं हैं सभी निराशा से पीड़ित व्यक्ति भी एंटीडिप्रैसेंट का उपयोग नहीं करते हैं.

Check Also

सागर में तीसरे दिन घटी कोरोना संक्रमितों की संख्या

कलेक्‍टर दीपक सिंह की कोरोना रिपोर्ट निगेटिव, काम पर लौटे सागर . जिले में आज …