तस्लीमा नसरीन के विचार अस्वीकार्य, वंदे मातरम मामले में अदालत पर भरोसा : सिद्दीकुल्ला चौधरी

कोलकाता, 17 जुलाई . जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष सिद्दीकुल्ला चौधरी ने लेखिका तस्लीमा नसरीन और ‘वंदे मातरम’ से जुड़े प्रस्तावित विधेयक पर तल्ख टिप्पणी की. उन्होंने तस्लीमा नसरीन की आलोचना करते हुए कहा कि मुस्लिम समुदाय ने उनके विचारों को स्वीकार नहीं किया और उन्हें समुदाय से बाहर कर दिया है.

वहीं, ‘वंदे मातरम’ से जुड़े प्रस्तावित कानून पर उन्होंने कहा कि यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है और अंतिम निर्णय अदालत ही करेगी.

तस्लीमा नसरीन को लेकर सिद्दीकुल्ला चौधरी ने कहा कि उनके लेखन और विचारों के कारण बांग्लादेश सहित दुनिया के कई हिस्सों में विरोध हुआ. तस्लीमा नसरीन ने इस्लाम और धार्मिक मान्यताओं के संबंध में ऐसी बातें लिखीं, जिन्हें मुस्लिम समुदाय स्वीकार नहीं कर सकता. इस मुद्दे पर उन्होंने तत्कालीन पश्चिम बंगाल के Chief Minister बुद्धदेव भट्टाचार्य को पत्र भी लिखा था और बाद में पूर्व Chief Minister ज्योति बसु से भी इस विषय पर चर्चा हुई थी. उनके विरोध के बाद तत्कालीन Government ने भी मामले को गंभीरता से लिया.

उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय अपने धार्मिक विश्वास, पैगंबर और इस्लामी परंपराओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील है और इन पर किसी भी प्रकार की टिप्पणी स्वीकार नहीं की जा सकती. उन्होंने तस्लीमा नसरीन के लेखन की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि अब उनका अध्याय समाप्त हो चुका है और मुस्लिम समुदाय उन्हें स्वीकार नहीं करता. India जैसे बहुधार्मिक देश में सभी धर्मों का सम्मान किया जाना चाहिए. पश्चिम बंगाल में मुसलमान और हिंदू वर्षों से साथ रहते आए हैं.

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दुर्गा पूजा और काली पूजा जैसे आयोजनों पर मुस्लिम समुदाय ने कभी आपत्ति नहीं जताई और सभी धर्मों के प्रति सम्मान का भाव बनाए रखा है. उनके अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता है और किसी दूसरे धर्म की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का किसी को अधिकार नहीं है.

वहीं, ‘वंदे मातरम’ के अपमान पर सजा का प्रावधान करने वाले प्रस्तावित विधेयक के संबंध में पूछे गए सवाल पर चौधरी ने कहा कि यह मामला फिलहाल न्यायालय के विचाराधीन है. उन्होंने बताया कि इस संबंध में उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया है और अब इस विषय पर अंतिम फैसला न्यायपालिका ही करेगी.

उन्होंने आगे कहा कि उच्चतम न्यायालय के पूर्व निर्णय में यह स्पष्ट किया गया है कि ‘वंदे मातरम’ गाने के लिए किसी व्यक्ति को बाध्य नहीं किया जा सकता. जो लोग इसे गाना चाहते हैं, वे गाएं और जो नहीं गाना चाहते, उन्हें बाध्य नहीं किया जाना चाहिए. इस संबंध में उन्होंने न्यायालय में अपील दायर की है, लेकिन फिलहाल उसके बारे में अधिक जानकारी सार्वजनिक नहीं करेंगे और अदालत के निर्णय का इंतजार करेंगे.

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