
चेन्नई, 25 जुलाई . डीएमके अध्यक्ष और तमिलनाडु के पूर्व Chief Minister एमके स्टालिन ने Saturday को Chief Minister सी. जोसेफ विजय की कावेरी जल विवाद पर चर्चा के लिए प्रस्तावित कर्नाटक यात्रा की कड़ी आलोचना की. उन्होंने उनसे इस ‘गलत निर्णय’ को छोड़ने का आग्रह किया. उन्होंने विजय से आगे कोई भी कदम उठाने से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाने की बात कही.
एक विस्तृत बयान में स्टालिन ने तर्क दिया कि कावेरी पर तमिलनाडु के अधिकार न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से पहले ही दृढ़ता से स्थापित हो चुके हैं और चेतावनी दी कि द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से इस मुद्दे को फिर से उठाने का कोई भी प्रयास राज्य की कानूनी स्थिति को कमजोर कर सकता है.
उन्होंने कहा कि कर्नाटक द्वारा तमिलनाडु को कावेरी का पानी छोड़ने से लगातार इनकार करना सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम फैसले की अवमानना है. उन्होंने दोहराया कि पड़ोसी राज्य द्वारा मेकेदातु संतुलन जलाशय के निर्माण का प्रस्ताव स्वयं उस फैसले का उल्लंघन है.
स्टालिन ने कहा कि कावेरी विवाद ऐसा मुद्दा नहीं है जिसे Political प्रतीकात्मकता या अनौपचारिक बातचीत के माध्यम से हल किया जा सके. इसके बजाय, उन्होंने Chief Minister से आग्रह किया कि नदी जल विवाद से संबंधित कोई भी पहल करने से पहले सभी Political दलों के नेताओं और किसान संगठनों के प्रतिनिधियों से परामर्श करें.
डीएमके नेता ने प्रस्तावित यात्रा के उद्देश्य पर भी सवाल उठाया और संदेह व्यक्त किया कि क्या इससे कोई ठोस परिणाम निकलेगा.
उन्होंने आरोप लगाया कि यह कवायद दिखावटी प्रतीत होती है, और बताया कि कर्नाटक में सत्ताधारी कांग्रेस तमिलनाडु में सत्तारूढ़ गठबंधन की सहयोगी है.
उनके अनुसार, इस यात्रा से राज्य Government केवल यह दावा कर पाएगी कि उसने कर्नाटक से सीधे बातचीत करने का प्रयास किया है, जबकि तमिलनाडु को इससे कोई ठोस लाभ नहीं मिलेगा.
स्टालिन ने तमिलनाडु Government पर ‘कर्नाटक के जाल’ में फंसने का आरोप लगाते हुए दावा किया कि पड़ोसी राज्य का उद्देश्य कावेरी जल पर तमिलनाडु के स्थापित अधिकारों को कमजोर करना है.
उन्होंने आगे कहा कि कावेरी डेल्टा के किसान प्रत्यक्ष वार्ता के निर्णय से बेहद असंतुष्ट हैं.
इस विवाद पर पिछली डीएमके Government के दृष्टिकोण को याद करते हुए स्टालिन ने कहा कि उनके प्रशासन ने कर्नाटक के साथ द्विपक्षीय वार्ता का लगातार विरोध किया था. उन्होंने यह तर्क देते हुए कि बार-बार की गई बातचीत से कोई परिणाम नहीं निकला क्योंकि पड़ोसी राज्य ने अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं किया था.
उन्होंने आगे कहा कि मेकेदातु परियोजना के लिए कर्नाटक का निरंतर दबाव स्वयं कावेरी पर तमिलनाडु के वैध अधिकारों को मान्यता देने से इनकार को दर्शाता है और डीएमके के इस लंबे समय से चले आ रहे रुख की पुष्टि करता है कि इस मुद्दे पर प्रत्यक्ष वार्ता करने का कोई लाभ नहीं है.
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एमएस/
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