
New Delhi, 2 जुलाई . Supreme Court ने Thursday को राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिन्हें उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) द्वारा तैयार किए गए फर्जी, अस्तित्वहीन और काल्पनिक न्यायिक मिसालों का सहारा लिया गया था.
Supreme Court ने न्यायिक निर्णयों में इस तरह की सामग्री के इस्तेमाल पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति घोषित करते हुए स्पष्ट किया कि न्यायिक फैसलों में इस तरह की नकली या मनगढ़ंत सामग्री का इस्तेमाल बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया जाएगा.
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि एआई से तैयार किए गए नकली या मनगढ़ंत न्यायिक उदाहरणों के आधार पर दिया गया फैसला कानून की नजर में वैध नहीं माना जा सकता. अदालत ने कहा कि इस तरह का फैसला कानून के शासन को कमजोर करता है.
Supreme Court ने कहा, “यह एक ऐसा मामला है, जिसमें ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले के समर्थन में एआई से तैयार की गई ऐसी सामग्री का इस्तेमाल किया, जो असल में मौजूद ही नहीं थी. यह सामग्री पूरी तरह नकली और मनगढ़ंत थी.”
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने एनसीएलटी के 28 अगस्त, 2024 के आदेश और एनसीएलएटी के 11 सितंबर, 2025 के फैसले को रद्द कर दिया. अदालत ने दिवालियापन से जुड़े मामले को नई सुनवाई के लिए फिर से एनसीएलटी के पास भेज दिया और उसे दो सप्ताह के भीतर नया फैसला सुनाने का निर्देश दिया.
Supreme Court ने कहा कि एआई न्यायिक प्रक्रिया में मदद कर सकता है, लेकिन वह इंसानी सोच और समझ की जगह नहीं ले सकता. अदालत ने कहा, “फैसला सुनाने की प्रक्रिया में एआई का इस्तेमाल सहायक के रूप में किया जा सकता है, लेकिन अंतिम फैसला और उसकी पूरी जिम्मेदारी न्यायाधीश के हाथ में ही रहनी चाहिए. हर चरण में इंसानी भूमिका बनी रहना जरूरी है.”
यह फैसला एसेल इंफ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड की निलंबित निदेशक पूजा रमेश सिंह की अपील पर आया. उन्होंने जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड की ओर से दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की धारा 7 के तहत शुरू की गई दिवालियापन की कार्यवाही को Supreme Court में चुनौती दी थी.
सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने कहा कि एनसीएलटी ने अपने फैसले में जिन कई न्यायिक उदाहरणों का हवाला दिया था, उनमें से कुछ असल में मौजूद ही नहीं थे. उन्होंने यह भी कहा कि कुछ मामलों में एआई से तैयार किए गए पैराग्राफ को गलत तरीके से Supreme Court के असली फैसलों का हिस्सा बताकर पेश किया गया था.
एनसीएलटी के फैसले में दिए गए पुराने न्यायिक उदाहरणों की स्वतंत्र रूप से जांच करने के बाद Supreme Court ने पाया कि कुछ फैसलों का हवाला ऐसे मामलों का था, जो असल में मौजूद ही नहीं थे. वहीं, कुछ मामलों में ऐसे पैराग्राफ शामिल थे, जो पूरी तरह मनगढ़ंत थे और असली फैसलों में कहीं दर्ज नहीं थे.
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि एनसीएलटी ने जिन फैसलों का हवाला दिया, वे असल में मौजूद ही नहीं थे. इसके अलावा एआई से तैयार किए गए कुछ पैराग्राफ को भी गलत तरीके से Supreme Court के असली फैसलों का हिस्सा बताकर पेश किया गया.”
कानूनी प्रक्रियाओं में एआई के बढ़ते इस्तेमाल पर चिंता जताते हुए Supreme Court ने कहा कि अदालतों को फैसला सुनाने की प्रक्रिया में एआई का इस्तेमाल करते समय उस पर पूरा नियंत्रण बनाए रखना चाहिए.
अदालत ने कहा, “हम जैसे लोगों के लिए, जो विवादों का निपटारा करते हैं और फैसले सुनाते हैं, एआई की ओर से बनाई गई नकली और मनगढ़ंत जानकारी का कानून में न्यायिक उदाहरण के तौर पर इस्तेमाल बेहद खतरनाक है. यह ठीक वैसा ही है जैसे मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का रिसाव, जो दिखाई नहीं देता, लेकिन चुपचाप बड़ा नुकसान पहुंचाता है. जब तक इसका पता चलता है, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है. यह न केवल न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करता है, बल्कि न्यायिक फैसलों की विश्वसनीयता को भी कमजोर कर देता है.”
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने एआई से तैयार सामग्री पर बिना जांच-पड़ताल के भरोसा करने के खिलाफ चेतावनी दी. अदालत ने कहा, “अदालतों को बिना सत्यापन के एआई से तैयार किए गए न्यायिक उदाहरणों को पेश करने, उनका हवाला देने या उनका इस्तेमाल करने के मामले में बिल्कुल भी ढील नहीं बरतनी चाहिए.”
अदालत ने कहा, “बिना जांच-पड़ताल के ऐसे फैसलों का हवाला देना वकील की पेशेवर जिम्मेदारी के खिलाफ है. इसी तरह, अगर कोई जज अपने फैसले के समर्थन में एआई से तैयार किए गए नकली या मनगढ़ंत न्यायिक उदाहरणों का इस्तेमाल करता है, तो यह भी एक गंभीर चूक मानी जाएगी.”
Supreme Court ने कहा, “हमें यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि कानून की नजर में ऐसा फैसला वैध नहीं माना जा सकता. अगर किसी फैसले में थोड़ी भी झूठी या मनगढ़ंत जानकारी का इस्तेमाल किया गया है, तो उसे रद्द कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि इससे न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता प्रभावित होती है.”
संस्थागत स्तर पर सुरक्षा उपायों की जरूरत बताते हुए Supreme Court ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) को एक समिति बनाने का निर्देश दिया. यह समिति अदालतों में वकीलों द्वारा एआई से तैयार किए गए नकली या मनगढ़ंत कानूनी उदाहरण पेश करने के मामलों की जांच करेगी.
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एसएचके/
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