शिवसेना (यूबीटी) के 6 एमपी के शिंदे गुट में विलय पर Supreme Court ने लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय और सांसदों से मांगा जवाब

New Delhi, 22 जुलाई . शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मंजूरी देने के Lok Sabha अध्यक्ष ओम बिरला के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर Supreme Court ने Wednesday को सुनवाई की.

Supreme Court ने Lok Sabha अध्यक्ष के कार्यालय और पार्टी छोड़ने वाले छह सांसदों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. हालांकि, अदालत ने फिलहाल Lok Sabha अध्यक्ष के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी.

शिवसेना (यूबीटी) के सांसद अरविंद सावंत ने Lok Sabha अध्यक्ष के फैसले को Supreme Court में चुनौती दी है. जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने मामले की सुनवाई की.

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि संसद में एक Political दल के रूप में शिवसेना (यूबीटी) का कामकाज प्रभावित हो गया है. पार्टी के ये छह सांसद अब उसके साथ नहीं हैं और Lok Sabha अध्यक्ष ने उनके दूसरी पार्टी में विलय को मान्यता दे दी है.

Lok Sabha अध्यक्ष ओम बिरला ने संसद के मानसून सत्र से पहले शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मंजूरी दी थी. इसके बाद Lok Sabha में शिवसेना (यूबीटी) के सांसदों की संख्या घटकर तीन रह गई. Lok Sabha अध्यक्ष ने दलबदल संबंधी प्रावधानों के तहत उनके विलय को मान्यता दी थी.

इससे पहले Tuesday को शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मंजूरी मिलने पर पार्टी नेता संजय राउत ने कहा, “ये बागी नहीं बल्कि गद्दार हैं. भगत सिंह और सुखदेव जैसे क्रांतिकारी बागी थे. Monday को सड़कों पर उतरे छात्र भी बागी थे, लेकिन जो पैसे लेकर बिक गए, वे गद्दार हैं. अगर हमारे छह सांसद उनके साथ चले गए हैं, तो वे गद्दार हैं. वे ‘मंगल मिलन’ में शामिल हो रहे हैं. अगर वे किसी असली संघर्ष में शामिल होते, तो मैं उन्हें स्वीकार करता.”

वहीं, शिवसेना के नेता संजय निरुपम ने कहा, “छह सांसदों ने कोई गैरकानूनी कदम नहीं उठाया है. कानून उन्हें यह अधिकार देता है कि अगर उनके पास दो-तिहाई बहुमत है तो वे किसी भी पार्टी में शामिल हो सकते हैं.”

ओपी/एएस