
New Delhi, 16 अप्रैल . Supreme Court ने Thursday को न्यायपालिका और सरकारी वकीलों के पदों पर महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित प्राधिकरण के पास जाने की सलाह दी.
याचिका में कहा गया था कि हाईकोर्ट और Supreme Court में जजों की नियुक्ति के दौरान योग्य महिला उम्मीदवारों को बराबरी का अवसर मिलना चाहिए और कम से कम 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए. इसके अलावा यह भी मांग की गई थी कि जिला अदालत, हाईकोर्ट और Supreme Court में Government की ओर से केस लड़ने वाले वकीलों के पदों पर भी महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाए.
याचिका में संसद में पेश आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि देश में कुल 813 कार्यरत जजों में से केवल 116 महिलाएं हैं, जो लगभग 14.27 प्रतिशत है. Supreme Court में भी फिलहाल केवल एक महिला जज मौजूद हैं. इस आंकड़े को याचिका में लैंगिक असंतुलन का उदाहरण बताया गया. हालांकि Supreme Court ने इस मामले में सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि यह नीति बनाने का विषय है और अदालत इसमें सीधे दखल नहीं दे सकती. कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा कि वे अपनी मांग को संबंधित प्राधिकरण के सामने रखें.
वहीं, Supreme Court ने मतदान को अनिवार्य किए जाने की मांग वाली याचिका पर भी सुनवाई से इनकार कर दिया. याचिकाकर्ता की मांग थी कि जो लोग जानबूझकर वोट न दें, उन पर जुर्माना लगे और उनकी सरकारी सुविधाएं सीमित कर दी जाएं.
इस पर चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि अगर कोई गरीब इंसान अपने रोजगार के चलते वोट डालने नहीं जा पाता है, तो आपके मुताबिक क्या उसे गिरफ्तार कर लेना चाहिए? लोगों को वोट के प्रति जागरूक करने के लिए अभियान चलाना चाहिए लेकिन वोट देना अनिवार्य नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने अंत में याचिकाकर्ता से कहा कि यह नीतिगत मसला है. आप अपनी मांग के साथ संबंधित अथॉरिटी का रुख कर सकते हैं.
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पीआईएम/पीएम
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