सजा पर रोक से इनकार के खिलाफ पूर्व विधायक की याचिका पर Supreme Court का नोटिस

New Delhi, 29 जुलाई . Supreme Court ने Wednesday को कांग्रेस के पूर्व विधायक राजेंद्र भारती की याचिका पर नोटिस जारी किया. भारती ने 1998 के रूरल डेवलपमेंट बैंक धोखाधड़ी मामले में मिली सजा पर रोक लगाने से दिल्ली हाई कोर्ट के इनकार को Supreme Court में चुनौती दी थी. हालांकि, Supreme Court ने फिलहाल उनकी सजा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है. इसके चलते विधायक पद के लिए उनकी अयोग्यता अभी जारी रहेगी.

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने अभियोजन पक्ष और जिला सहकारी कृषि ग्रामीण विकास बैंक (इसके जनरल मैनेजर के माध्यम से) से जवाब मांगा है. कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद तय की है.

Supreme Court द्वारा फिलहाल दोषसिद्धि पर रोक लगाने से इनकार किए जाने के कारण, Madhya Pradesh विधानसभा के सदस्य के रूप में राजेंद्र भारती की अयोग्यता अभी जारी रहेगी.

भारती ने दिल्ली हाई कोर्ट के 10 जुलाई के फैसले को Supreme Court में चुनौती दी है. हाई कोर्ट ने New Delhi की विशेष एमपी/एमएलए कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था. अपने फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि सजा पर रोक लगाना एक असाधारण अधिकार है, जिसका इस्तेमाल केवल “विशेष परिस्थितियों” में ही किया जाना चाहिए. कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में उसे कोई स्पष्ट गलती नजर नहीं आई.

भारती की इस दलील को खारिज करते हुए कि दतिया विधानसभा उपचुनाव एक ऐसी अपूरणीय क्षति है, जिसके कारण दोषसिद्धि पर रोक लगाई जानी चाहिए, जस्टिस मनोज जैन की एकल पीठ ने कहा, “इसका जवाब नहीं में ही होगा.”

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि यह समस्या सिर्फ भारती के सामने नहीं थी, बल्कि यह चुने हुए जनप्रतिनिधियों को अयोग्य ठहराने से जुड़े कानूनी प्रावधानों के कारण उत्पन्न हुई थी.

कोर्ट ने आगे कहा कि सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति एमएलए या एमपी है और उसकी Political स्थिति पर असर पड़ रहा है, सजा पर रोक लगाने का आधार नहीं बन सकता. कोर्ट ने यह भी कहा कि “जब तक फैसले में कोई गंभीर गलती या बुनियादी कमी नहीं हो, तब तक सजा पर रोक नहीं लगाई जा सकती.”

रिकॉर्ड की शुरुआती जांच के आधार पर दिल्ली हाई कोर्ट को ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई “स्पष्ट या बड़ी गलती” नजर नहीं आई.

रिकॉर्ड में पाया गया कि फिक्स्ड डिपॉजिट की अवधि को कथित तौर पर चरणबद्ध तरीके से तीन साल से बढ़ाकर पहले 10 साल और फिर 15 साल कर दिया गया था. इसके कारण भारती से जुड़े एक फैमिली ट्रस्ट को मूल मैच्योरिटी अवधि खत्म होने के बाद भी कई वर्षों तक 13.5 प्रतिशत की ब्याज दर मिलती रही.

स्पेशल एमपी/एमएलए कोर्ट ने भारती और उनके सह-आरोपी रघुवीर शरण प्रजापति को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं — जैसे 120बी, 420, 467, 468, 471 और 409 — के तहत दोषी ठहराया. यह मामला 1998 में दतिया के जिला सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित था.

अभियोजन पक्ष के अनुसार, भारती और अन्य आरोपियों ने फिक्स्ड डिपॉजिट में कथित हेरफेर की साजिश रची और इसकी अवधि पूरी होने के बाद भी अधिक ब्याज का लाभ लेते रहे.

भारती को तीन साल की सज़ा और 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया. हालांकि, उनकी सजा पर रोक लगा दी गई और उन्हें जमानत मिल गई. लेकिन, दोषसिद्धि का फैसला बरकरार रहा. इसके चलते ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951’ की धारा 8, संविधान के अनुच्छेद 191(1)(ई) और ‘लिली थॉमस मामले’ में Supreme Court के 2013 के फैसले के तहत उन्हें तुरंत अयोग्य घोषित कर दिया गया.

दोषी ठहराए जाने के कारण उनकी Madhya Pradesh विधानसभा की सदस्यता समाप्त हो गई. इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने दतिया विधानसभा सीट को खाली घोषित कर दिया, जिसके बाद India निर्वाचन आयोग ने उपचुनाव की घोषणा की.

एसएचके/एएस