
New Delhi, 2 अगस्त . भारतीय फुटबॉल के महानतम खिलाड़ियों में शुमार सुनील छेत्री ने राष्ट्रीय टीम के लिए सर्वाधिक गोल करने का रिकॉर्ड बनाया और लंबे समय तक कप्तानी की. उनकी नेतृत्व क्षमता, फिटनेस और निरंतर प्रदर्शन ने भारतीय फुटबॉल को नई पहचान दिलाई है.
3 अगस्त 1984 को तत्कालीन आंध्र प्रदेश के सिकंदराबाद में जन्मे सुनील छेत्री के पिता केबी छेत्री फौज में रहे हैं, जो एक शानदार फुटबॉलर भी थे. सुनील छेत्री की मां सुशीला नेपाल की राष्ट्रीय टीम के लिए फुटबॉल खेल चुकी थीं. ऐसे में फुटबॉल सुनील की रगों में बसा था.
पिता आर्मी में थे, जिसके कारण पिता के ट्रांसफर के साथ-साथ सुनील छेत्री को अलग-अलग शहरों में रहकर बार-बार स्कूल बदलना पड़ा, लेकिन फुटबॉल के प्रति उनका जुनून कम न हुआ. हालांकि, उन्होंने कभी प्रोफेशनल फुटबॉलर बनने पर विचार नहीं किया. वह सिर्फ इसलिए फुटबॉल खेलते थे, ताकि एक अच्छे कॉलेज में एडमिशन पा सकें.
छेत्री अपने अनुशासन, कड़ी मेहनत, फिटनेस और कभी हार न मानने वाले जज्बे से युवाओं को प्रेरित करते हैं. सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए साबित किया कि समर्पण और लगन से बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं. उनका नेतृत्व और विनम्र स्वभाव भी खिलाड़ियों के लिए मिसाल है.
जब सुनील छेत्री 12वीं क्लास में थे, तो उन्हें कुआलालंपुर में आयोजित एशियन स्कूल चैंपियनशिप के लिए भारतीय टीम में शामिल किया गया. इस बीच मोहन बागान छेत्री की प्रतिभा पहचान चुका था; उन्होंने अपने क्लब में छेत्री को शामिल किया, जिसके बाद इस फुटबॉलर ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
सुनील छेत्री ने साल 2005 में भारतीय सीनियर टीम के लिए डेब्यू किया. साल 2007 में उन्होंने पहला अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट खेला, जिसमें उन्होंने चार गोल दागते हुए साल 1997 के बाद पहली बार टीम को ट्रॉफी उठाने में मदद की. साल 2008 में उन्होंने एफसी चैलेंज कप में चार गोल किए. इस दौरान फाइनल में हैट्रिक भी लगाई. India ने टूर्नामेंट अपने नाम किया, जिसने उन्हें भारतीय फुटबॉल का ‘पोस्टर ब्वॉय’ बना दिया.
सैफ चैंपियनशिप 2011 में छेत्री ने सर्वाधिक 7 गोल दागे. यह एक सीजन में किसी भी खिलाड़ी के सर्वाधिक गोल का रिकॉर्ड था. छेत्री के शानदार प्रदर्शन के साथ India ने खिताब अपने नाम किया. उन्हें उम्दा प्रदर्शन के लिए ‘प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट’ चुना गया. उन्हें एएफसी चैलेंज कप क्वालिफायर्स 2012 में पहली बार भारतीय टीम की कमान सौंपी गई. उन्होंने इसी साल India को एक बार फिर नेहरू कप ट्रॉफी का खिताब जिताया.
सुनील छेत्री करीब 8 वर्षों तक जेसीटी, ईस्ट बंगाल और डेम्पो जैसे नामी क्लब की तरफ से भी खेले. उनके शानदार प्रदर्शन ने विदेशी क्लबों को भी आकर्षित किया. साल 2007 में छेत्री इंग्लैंड में कोवेंट्री सिटी के लिए ट्रायल देने पहुंचे, लेकिन सफलता नहीं मिली.
इसके बाद लंदन के क्वींस पार्क रेंजर्स क्लब ने उनके साथ एक कॉन्ट्रैक्ट किया, लेकिन वर्क परमिट के मुद्दे ने इस मौके को बर्बाद कर दिया. साल 2010 में उन्हें यूएसए के मेजर लीग सॉकर में कैनसस सिटी विजार्ड्स के लिए साइन किया गया, जिसके बाद सुनील छेत्री विदेशी फुटबॉल क्लब में खेलने वाले तीसरे भारतीय बन गए.
साल 2012 में छेत्री को स्पोर्टिंग क्लुब डे पुर्तगाल की तरफ से बुलावा आया. इसके बाद आई-लीग में Bengaluru एफसी ने उन्हें अपने साथ जोड़ा. साल 2015 में India में इंडियन सुपर लीग की शुरुआत हुई, जिसमें छेत्री सबसे महंगे भारतीय रहे. अगले साल उन्होंने Mumbai सिटी एफसी को प्लेऑफ में पहुंचाने में मदद की.
इंटरकांटिनेंटल कप 2018 में सुनील छेत्री ने अपना 100वां अंतरराष्ट्रीय मैच खेला. इसी टूर्नामेंट में उन्होंने लियोनेल मेसी के 64 अंतरराष्ट्रीय गोल का रिकॉर्ड भी तोड़ा.
सुनील छेत्री रिकॉर्ड सात बार ‘ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन प्लेयर ऑफ द ईयर’ रहे हैं. उन्होंने साल 2007, 2011, 2013, 2014, 2017, 2018-19 और 2021-22 में यह खिताब अपने नाम किया है. फुटबॉल में शानदार प्रदर्शन के लिए उन्हें साल 2011 में ‘अर्जुन पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया, जिसके बाद साल 2019 में ‘पद्म श्री’ से नवाजा गया. साल 2021 में छेत्री ‘मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार’ पाने वाले पहले भारतीय फुटबॉलर बने.
सुनील छेत्री ने अपने अनुशासन, कड़ी मेहनत, फिटनेस और कभी हार न मानने वाले जज्बे से युवाओं को प्रेरित करते हैं. उन्होंने निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर साबित किया कि समर्पण और लगन से बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं. छेत्री का नेतृत्व और विनम्र स्वभाव भी खिलाड़ियों के लिए मिसाल है.
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आरएसजी
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