
Mumbai , 23 जुलाई . शिवसेना (यूबीटी) ने Thursday को केंद्र Government पर आरोप लगाया कि वह बड़े कॉर्पोरेट लोन डिफॉल्टर्स को बचा रही है, जबकि गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों से लोन की वसूली के लिए सख्त कदम उठा रही है.
पार्टी ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में कहा कि Lok Sabha में केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी के लिखित जवाब के मुताबिक, पब्लिक सेक्टर के बैंकों ने वित्त वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच 1,249 ऐसे खातों के 7.75 लाख करोड़ रुपए के बैड लोन बट्टे खाते में डाल दिए, जिनमें प्रत्येक पर 100 करोड़ रुपए या उससे अधिक का बकाया था. पार्टी ने कहा कि इतने बड़े डिफॉल्ट के बावजूद बैंक अब तक केवल 3.10 लाख करोड़ रुपए ही वसूल कर पाए हैं.
Government ने संसद में कहा कि लोन को बट्टे खाते में डालना (राइट ऑफ) एक सामान्य तकनीकी लेखा प्रक्रिया है. इसका मतलब यह नहीं है कि लोन माफ कर दिया गया है.
हालांकि ‘सामना’ के संपादकीय में Government के इस तर्क को चौंकाने वाला और पाखंडपूर्ण बताया गया. शिवसेना (यूबीटी) ने सवाल उठाया कि मोदी Government सत्ता में आने के बाद से बैंकिंग व्यवस्था में वित्तीय अनुशासन लाने का दावा करती रही है. फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि बड़े उद्योगपति बैंकों का इतना बड़ा कर्ज नहीं चुकाएं और Government वसूली करने के बजाय उसे बैड लोन के रूप में बट्टे खाते में डाल दे?
संपादकीय में कहा गया, “बड़ा लोन लेना, उसका थोड़ा सा हिस्सा चुकाना और बाकी रकम नहीं लौटाना मानो सरकारी मंजूरी के साथ हो रहा है.” इसमें मौजूदा दौर को लोन डिफॉल्ट का अमृत काल बताया गया. देश में ऐसी स्थिति बन गई है कि गरीब लोगों को लोन की किस्तें चुकाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, जबकि अरबपति बैंकों का हजारों करोड़ रुपए का कर्ज नहीं चुकाते. अगर Government भी इसमें शामिल है तो जनता के पैसे की लूट करने वालों को कौन रोकेगा?”
संपादकीय में एक बड़ा मुद्दा यह भी उठाया गया कि Government बड़े कॉर्पोरेट लोन डिफॉल्टर्स के नाम सार्वजनिक करने से इनकार कर रही है. Government का कहना है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया अधिनियम की धारा 45ई के तहत कर्ज से जुड़ी जानकारी गोपनीय रखी जाती है, इसलिए इन लोगों के नाम सार्वजनिक नहीं किए जा सकते.
संपादकीय में Government के इस तर्क पर सवाल उठाए गए. इसमें कहा गया, “छोटे लोन डिफॉल्टर्स के नाम सार्वजनिक किए जाते हैं, लेकिन बड़े उद्योगपतियों के नाम गोपनीयता का हवाला देकर क्यों छिपाए जाते हैं? मध्यम वर्ग के लोगों, छोटे कारोबारियों और किसानों की छोटी सी चूक पर उनकी संपत्तियां, गाड़ियां और घर जब्त या सील कर दिए जाते हैं, जबकि बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्टर्स के खिलाफ ऐसी कार्रवाई क्यों नहीं होती?”
ठाकरे गुट ने सवाल उठाया कि क्या बड़े लोन डिफॉल्टर्स सत्ताधारी पार्टी को भारी चंदा देते हैं. पार्टी ने आरोप लगाया कि इसके पीछे “चंदा दो, लोन माफ कराओ” जैसी एक अघोषित नीति काम कर रही है.
संपादकीय में कहा गया कि आम लोगों और बड़े उद्योगपतियों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया जाता है. इसमें कहा गया कि जहां आम टैक्स देने वाले लोग छोटे-छोटे लोन चुकाने के लिए अपने खर्चों में कटौती करते हैं, वहीं अमीर उद्योगपतियों को सरकारी बैंकों का बड़ा कर्ज नहीं चुकाने पर भी कार्रवाई से बचाया जाता है.
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) ने आरोप लगाया कि उद्योग जगत के धोखेबाज़ों और Government में बैठे लोगों की मिलीभगत से सरकारी बैंकों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है. पार्टी ने कहा कि अगर Government ऐसे लोगों को बचाती रही, तो जनता का पैसा सुरक्षित नहीं रहेगा.
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एसएचके/
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