
Mumbai , 17 जुलाई . गजल की दुनिया में शहंशाह-ए-गजल कहलाने वाले मेहदी हसन ने अपनी आवाज से करोड़ों लोगों को दीवाना बनाया. उन्होंने हौसले और मेहनत के दम पर कामयाबी हासिल की. एक वक्त ऐसा था, जब वह परिवार का पेट पालने के लिए साइकिल की दुकान पर काम किया करते थे. इन मुश्किल हालातों में भी उन्होंने संगीत से अपना रिश्ता कभी खत्म नहीं होने दिया और आखिरकार गजल की दुनिया के सबसे बड़े नामों में शामिल हो गए.
मेहदी हसन का जन्म 18 जुलाई 1927 को Rajasthan के झुंझुनू जिले में हुआ था. उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था, जहां संगीत पीढ़ियों से मौजूद था. उनके पिता उस्ताद अजीम खान और चाचा उस्ताद इस्माइल खान बड़े कलाकार थे. उन्हें बचपन से ही संगीत का माहौल मिला और महज 8 साल की उम्र में संगीत की शिक्षा लेना शुरू कर दिया था. कम उम्र में ही उन्होंने शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीख ली थीं. 18 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते मेहदी हसन ध्रुपद, ठुमरी और खयाल गायकी में काफी निपुण हो चुके थे.
जब उनका करियर आगे बढ़ने वाला था, तभी देश के बंटवारे ने उनकी जिंदगी बदल दी. साल 1947 में भारत-Pakistan के विभाजन के बाद मेहदी हसन परिवार के साथ Pakistan चले गए. नई जगह पर शुरुआत करना आसान नहीं था. परिवार आर्थिक संकट से गुजर रहा था और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया था. ऐसे समय में मेहदी हसन ने परिवार की जिम्मेदारी संभालने के लिए साइकिल की दुकान पर मैकेनिक का काम शुरू किया, लेकिन संगीत के प्रति अपना जुनून कभी कम नहीं होने दिया.
दिन में वह काम किया करते थे और रात को रियाज करते थे. यही रियाज आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना. करीब दस साल तक संघर्ष करने के बाद साल 1957 में उन्हें रेडियो Pakistan पर गाने का मौका मिला. शुरुआत में उन्होंने ठुमरी गाकर पहचान बनाई, लेकिन जल्द ही उन्होंने गजल गायकी की ओर रुख किया. उनकी शास्त्रीय संगीत की समझ और शब्दों को महसूस करके गाने की शैली ने उन्हें बाकी गायकों से अलग पहचान दी. देखते ही देखते मेहदी हसन गजल की दुनिया का बड़ा नाम बन गए.
इसके बाद उन्होंने Pakistanी फिल्मों के लिए भी कई यादगार गीत गाए. उनकी लोकप्रियता सिर्फ Pakistan तक सीमित नहीं रही, बल्कि India समेत पूरी दुनिया में उनके फैंस बन गए. उनकी गाई हुई गजलें ‘रंजिश ही सही’, ‘गुलों में रंग भरे’, ‘अब के हम बिछड़े तो शायद’, ‘दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है’ और ‘मोहब्बत करने वाले कम न होंगे’ आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं.
मेहदी हसन की आवाज के मुरीद India के भी कई बड़े कलाकार थे. महान गायिका लता मंगेशकर ने उनकी गायकी की तारीफ करते हुए कहा था कि ऐसा लगता है जैसे मेहदी हसन साहब के गले में भगवान बोलते हैं. जगजीत सिंह समेत कई बड़े गायकों ने उन्हें अपना प्रेरणास्रोत माना.
संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले. Pakistan Government ने उन्हें प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस, तमगा-ए-इम्तियाज, हिलाल-ए-इम्तियाज और निशान-ए-इम्तियाज जैसे सम्मानों से नवाजा. India में उन्हें साल 1979 में केएल सहगल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. नेपाल Government ने भी उन्हें गोरखा दक्षिणा बाहु सम्मान दिया.
मेहदी हसन का निधन 13 जून 2012 को कराची में हुआ. बीमारी के कारण उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी आवाज आज भी जिंदा है.
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पीके/एबीएम
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