वैज्ञानिक बीना पिल्लई देश के प्रमुख बायोटेक संस्थान आरजीसीबी की नई निदेशक नियुक्त

तिरुवनंतपुरम, 16 अप्रैल . देश के प्रमुख जैव प्रौद्योगिकी संस्थानों में से एक, राजीव गांधी जैव प्रौद्योगिकी केंद्र (ब्रिक-आरजीसीबी) की नई निदेशक के रूप में प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. बीना पिल्लई की नियुक्ति की गई है. यह नियुक्ति केंद्र Government की कैबिनेट की नियुक्ति समिति द्वारा स्वीकृत की गई है और उनका कार्यकाल पांच वर्षों का होगा.

जैव प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान और नवाचार परिषद के तहत कार्यरत आरजीसीबी देश में रोग जीवविज्ञान, ट्रांसलेशनल साइंस और तकनीकी विकास के क्षेत्र में अहम भूमिका निभाता है. ऐसे में यह नेतृत्व परिवर्तन India की बायोटेक्नोलॉजी महत्वाकांक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

डॉ. पिल्लई, प्रोफेसर चंद्रभास नारायण का स्थान लेंगी, जिनका कार्यकाल पिछले साल सितंबर में समाप्त हुआ था. वह ऐसे समय में यह जिम्मेदारी संभाल रही हैं, जब संस्थान उच्च प्रभाव वाले नए क्षेत्रों में विस्तार की तैयारी कर रहा है.

वर्तमान में वह सीएसआईआर जीनोमिक्स और इंटीग्रेटिव बायोलॉजी संस्थान (सीएसआईआर-आईजीआईबी) में मुख्य वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत हैं और आरएनए बायोलॉजी तथा न्यूरोनल विकास के क्षेत्र में उनके कार्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है.

उनका शोध आरएनए की भूमिका, प्रारंभिक विकास, न्यूरोजेनेसिस, व्यवहार और रोगों की संवेदनशीलता पर केंद्रित रहा है. उन्होंने मानव रोगों में माइक्रो आरएनए मार्करों की पहचान में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है.

केरल के कलाडी की रहने वाली डॉ. पिल्लई ने Mumbai के रामनारायण रूइया कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई की और भारतीय विज्ञान संस्थान से इंटीग्रेटेड एमएस-पीएचडी किया. इसके बाद उन्होंने सीएसआईआर-आईजीआईबी में जीनोमिक्स और मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के क्षेत्र में मजबूत शोध कार्यक्रम स्थापित किया.

उनके वैज्ञानिक योगदान के लिए उन्हें नेशनल बायोसाइंस अवॉर्ड, आईएनएसए यंग साइंटिस्ट अवॉर्ड और सीएसआईआर यंग साइंटिस्ट अवॉर्ड (बायोलॉजिकल साइंसेज) सहित कई सम्मान मिल चुके हैं.

उनके नेतृत्व में आरजीसीबी में सीजीएमपी मानकों के अनुरूप सुविधा, बायो-मैन्युफैक्चरिंग हब और ऑन्कोलॉजी रेफरल अस्पताल जैसी प्रमुख राष्ट्रीय परियोजनाओं को गति मिलने की उम्मीद है.

इस नियुक्ति को India की रिसर्च से इनोवेशन तक की प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है और संस्थान के वैज्ञानिक समुदाय ने अत्याधुनिक शोध को बढ़ावा मिलने की उम्मीद जताई है.

डीएससी