राम प्रसाद बिस्मिल: ‘सरफरोशी की तमन्ना’ के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमने वाला क्रांतिवीर

New Delhi, 10 जून . ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है.’ इस पंक्ति से लगभग हर भारतीय परिचित है. यह पंक्ति आज भी देशवासियों के हृदय में देशभक्ति की भावना का संचार करती है. इसे स्वतंत्रता सेनानियों के बीच लोकप्रिय बनाने वाले महान क्रांतिकारी, कवि और लेखक पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ने India की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. उन्होंने न केवल अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी, बल्कि अपनी लेखनी के माध्यम से युवाओं के भीतर स्वतंत्रता की ज्वाला भी प्रज्वलित की. बिस्मिल ने महज 30 वर्ष की आयु में हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था.

राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में एक ब्राह्मण परिवार में 11 जून 1897 को हुआ था. उनके पिता पंडित मुरलीधर नगरपालिका में कर्मचारी थे और माता का नाम मूलमती (मूलारानी) था. सीमित आर्थिक संसाधनों के बीच उनका बचपन बीता. बचपन में उनकी रुचि पढ़ाई की अपेक्षा खेल-कूद में अधिक थी. किशोरावस्था में उनमें कुछ गलत आदतें भी आ गई थीं, लेकिन समय के साथ उनके जीवन में ऐसा परिवर्तन आया जिसने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों की श्रेणी में ला खड़ा किया.

महज सात वर्ष की आयु में उनके पिता ने घर पर ही उन्हें हिंदी की शिक्षा देना शुरू कर दिया. उस दौर में उर्दू का भी विशेष प्रभाव था, इसलिए उन्हें उर्दू सीखने के लिए मौलवी के पास भेजा गया. पंडित मुरलीधर अपने पुत्र की शिक्षा को लेकर बेहद गंभीर थे और लापरवाही पर कठोर अनुशासन भी बरतते थे. उनके जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया, जब वे नौवीं कक्षा में पढ़ते हुए आर्य समाज के संपर्क में आए. शाहजहांपुर स्थित आर्य समाज मंदिर में उनकी मुलाकात स्वामी सोमदेव से हुई, जिनका उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ा. इसी दौरान उन्होंने राष्ट्रभक्ति और सामाजिक सुधार के विचारों को आत्मसात किया.

जब वे लगभग 18 वर्ष के थे, तब स्वतंत्रता सेनानी भाई परमानंद को ब्रिटिश Government ने गदर षड्यंत्र मामले में फांसी की सजा सुनाई, जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया. इस घटना ने युवा बिस्मिल को भीतर तक झकझोर दिया. उन्होंने ‘मेरा जन्म’ शीर्षक से कविता लिखी, जिसमें देश को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराने का संकल्प स्पष्ट रूप से झलकता था. इसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी.

कांग्रेस के Lucknow अधिवेशन में उन्होंने नरम दल के विरोध के बावजूद लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की भव्य शोभायात्रा निकाली. इसी दौरान उनकी मुलाकात केशव बलिराम हेडगेवार, सोमदेव शर्मा और मुकुंदीलाल जैसे राष्ट्रवादियों से हुई. बाद में उन्होंने अपने साथियों के सहयोग से ‘अमेरिका की स्वतंत्रता का इतिहास’ पुस्तक प्रकाशित की, जिस पर तत्काल प्रतिबंध लगा दिया गया.

बिस्मिल का जुड़ाव औरैया के क्रांतिकारी पंडित गेंदालाल दीक्षित से भी रहा. उन्होंने मातृवेदी संगठन के माध्यम से अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया. इसी काल में उनकी प्रसिद्ध कविता ‘मैनपुरी की प्रतिज्ञा’ लोगों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुई. एक मुखबिर की गद्दारी के कारण कई क्रांतिकारी शहीद हो गए और बिस्मिल को लगभग दो वर्षों तक भूमिगत रहना पड़ा. हालांकि, अंग्रेज उन्हें पकड़ नहीं सके. इस दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण रचनाएं और पुस्तकें भी लिखीं.

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में काकोरी कांड एक महत्वपूर्ण अध्याय है. क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने और ब्रिटिश सत्ता को सीधी चुनौती देने के उद्देश्य से 9 अगस्त 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल ने चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, शचीन्द्रनाथ बक्शी तथा अन्य साथियों के साथ Lucknow के निकट काकोरी स्टेशन के पास चलती ट्रेन को रोककर सरकारी खजाना अपने कब्जे में ले लिया. इस घटना ने ब्रिटिश शासन को झकझोर कर रख दिया.

काकोरी कांड के बाद अंग्रेजी Government ने बड़े पैमाने पर कार्रवाई की. 26 सितंबर 1925 को बिस्मिल समेत लगभग 40 लोगों को गिरफ्तार किया गया. लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई. 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में महज 30 वर्ष की आयु में राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी दे दी गई. फांसी के फंदे तक पहुंचते समय भी उनके चेहरे पर मुस्कान थी और वे ईश्वर का स्मरण कर रहे थे.

‘मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे, बाकी न मैं रहूं न मेरी आरजू रहे.

जब तक कि तन में जान, रगों में लहू रहे, तेरा ही जिक्र या तेरी ही जुस्तजू रहे.’

उनकी अंतिम इच्छा भी यही थी कि ब्रिटिश साम्राज्य का अंत हो और India स्वतंत्र बने. वे हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए, लेकिन देशवासियों के दिलों में अमर हो गए. राम प्रसाद बिस्मिल की लेखनी ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की थी.

/एएस