
jaipur, 16 अप्रैल . स्थानीय परंपराओं का सम्मान करते हुए पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, Rajasthan Government ने Thursday को जैसलमेर जिले में ‘ओरण’ (पवित्र उपवन) भूमि को आरक्षित करने की एक बड़ी पहल की है, ताकि मरुस्थलीय क्षेत्र में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखा जा सके.
‘ओरण’ एक सदियों पुरानी व्यवस्था है जो सामाजिक-धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है. इसके तहत, स्थानीय समुदाय इन क्षेत्रों में पेड़ों या प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान न पहुंचाकर पवित्र उपवनों की रक्षा करते हैं.
इन क्षेत्रों में पेड़ों को काटना या कुल्हाड़ी का इस्तेमाल करना पारंपरिक रूप से वर्जित है, जिससे ये पारिस्थितिकी तंत्र पीढ़ियों तक स्वाभाविक रूप से संरक्षित रहते हैं.
ये पवित्र भू-दृश्य आस्था और संरक्षण के एक अद्वितीय संगम का प्रतिनिधित्व करते हैं.
इस पहल के तहत, जैसलमेर जिले के विभिन्न गांवों में ‘ओरण’ के उद्देश्यों के लिए कुल 3,666.2139 हेक्टेयर भूमि आरक्षित की गई है.
रामगढ़ तहसील में, दिलावर का गांव में 124.9502 हेक्टेयर, कुचड़ी में 1,084.8043 हेक्टेयर और पूनम नगर में 583.9876 हेक्टेयर भूमि आरक्षित की गई है. फतेहगढ़ तहसील में, भीमसर में 952.2752 हेक्टेयर और बिनजोता में 96.7716 हेक्टेयर भूमि को ‘ओरण’ क्षेत्र के रूप में नामित किया गया है.
इसके अतिरिक्त, जैसलमेर तहसील में, मोकला गांव में तीन खंडों में क्रमशः 187.364 हेक्टेयर, 256.2511 हेक्टेयर और 253.4034 हेक्टेयर भूमि आरक्षित की गई है; साथ ही बिरमा कानोड़ में 126.4065 हेक्टेयर भूमि आरक्षित है.
राज्य Government ‘ओरण’ संरक्षण के लिए अतिरिक्त भूमि आरक्षित करने की प्रक्रिया में भी है.
इसमें मोकला गांव (जैसलमेर तहसील) में 1,457.4991 हेक्टेयर, आस्कंद्रा गांव और दीधू गांव (नाचना तहसील) में क्रमशः 225.03 हेक्टेयर और 229.5067 हेक्टेयर, तथा मोहनगढ़ बारानी/पन्नोधराय गांव में 333.9165 हेक्टेयर भूमि शामिल है.
‘ओरण’ शब्द संस्कृत के शब्द ‘अरण्य’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है एक अछूता जंगल. ये क्षेत्र न केवल प्राचीन सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का प्रतिबिंब हैं, बल्कि शुष्क क्षेत्रों में मरुस्थलीकरण को रोकने और जैव विविधता को संरक्षित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इस पहल से जैसलमेर में संरक्षण प्रयासों को मज़बूती मिलने की उम्मीद है, साथ ही इससे आस्था के पारंपरिक स्थलों की सुरक्षा होगी और रेगिस्तानी क्षेत्र में हरियाली व जैव विविधता बढ़ेगी.
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एससीएच
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