
New Delhi, 27 जून . India की आजादी के चार दशक तक भले सब लोग यह मानकर चलते रहे कि देश को चलाने का हुनर सिर्फ नेहरू-गांधी परिवार के पास ही है, मगर पीवी नरसिम्हा राव ने अपने निर्णयों और काबिलियत से सबको गलत साबित किया. गांधी-नेहरू परिवार से बाहर के जो लोग देश के Prime Minister बने, उनमें पीवी नरसिम्हा राव भी शामिल थे. उनके अपने कई किस्से और कहानियां हैं, मगर कांग्रेस के भीतर ही उनका सम्मान और अनादर दोनों हुए. यहां तक कि एक समय पर कुछ कांग्रेसियों ने उन्हें खुद अपना नहीं माना था.
28 जून 1921 को तेलंगाना के करीमनगर में जन्मे पीवी नरसिम्हा राव जब 1991 में राजनीति छोड़ने का विचार कर रहे थे, तब राजीव गांधी की दुखद हत्या के कारण उन्हें Prime Minister का पद संभालना पड़ा. Prime Minister के रूप में उनका कार्यकाल पंजाब और असम में कानून व्यवस्था की समस्याओं व गंभीर भुगतान संतुलन के संकट के साथ शुरू हुआ. इन समस्याओं को हल करने और उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की ओर दूरगामी आर्थिक सुधार शुरू करने का श्रेय उनके नेतृत्व को दिया गया था.
कहा जाता है कि पीवी नरसिम्हा राव की ही काबिलियत थी कि जो हालात आज Pakistan के हैं, उस हालातों में पहुंचने से पहले उन्होंने India को बचा लिया था. इसके बाद उनके नेतृत्व में India ने न सिर्फ मिसाइल, परमाणु और मोबाइल प्रौद्योगिकियों में प्रगति की, बल्कि उनके कार्यकाल में ही मध्याह्न भोजन योजना, पीएम रोजगार योजना आदि जैसे कई कल्याणकारी कार्यक्रम भी शुरू हुए. नरसिंह राव की विरासत नवोदय स्कूल, लुक ईस्ट पॉलिसी, आर्थिक सुधार और भूमि सुधार जैसी ऐतिहासिक पहलों के साथ भारतीय इतिहास में भी दर्ज हुई.
फिर एक समय वह भी आया, जब पीवी नरसिम्हा राव की सोच को ‘हिंदू समर्थक मानसिकता’ करार दे दिया गया था. यह आवाज खुद कांग्रेस के भीतर से उठी थी. पीवी नरसिम्हा राव के Prime Minister बनने के कुछ महीनों बाद ही 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचे को कारसेवकों ने ढहा दिया था.
माखनलाल फोतेदार जैसे नेताओं ने इसके लिए पीवी नरसिम्हा राव को जिम्मेदार ठहराया था. माखनलाल फोतेदार ने विवादित ढांचे को गिराए जाने और उस समय पीवी नरसिम्हा राव के रुख के बारे में अपनी आत्मकथा ‘द चिनार लीव्स’ में काफी कुछ लिखा. इसके बाद, कुलदीप नैयर की किताब ‘बियॉन्ड द लाइंस’ में पीवी नरसिम्हा राव पर अनदेखी के आरोप लगाए गए.
पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने इस घटनाक्रम को नरसिम्हा राव के कार्यकाल की सबसे बड़ी असफलता करार दिया था. इसके बाद, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणि शंकर अय्यर यहां तक कह चुके हैं कि नरसिम्हा राव की ‘हिंदू-समर्थक सोच’ ने 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराने में बढ़ावा दिया. कांग्रेस नेता ने यहां तक बोल दिया था कि नरसिम्हा राव भाजपा के पहले Prime Minister थे.
अय्यर ने 2016 में एक किताब के विमोचन के दौरान कहा था, “पूर्व Prime Minister पीवी नरसिम्हा राव का हिंदुत्व की ओर झुकाव ही बाबरी मस्जिद विध्वंस की वजह थी.”
इसके अलावा, यह सिर्फ बाबरी मस्जिद का मसला नहीं था, बल्कि पीवी नरसिम्हा राव और सोनिया गांधी के बीच मनमुटाव के भी अनेक किस्से रहे हैं. यही कारण थे कि 23 दिसंबर 2004 में निधन के बाद तकरीबन डेढ़ दशक तक कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें भुला दिया था.
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डीसीएच/डीकेपी
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