
भुवनेश्वर, 29 मई . नारायण को अति प्रिय पुरुषोत्तम मास चल रहा है. इस पावन महीने में भगवान विष्णु की आराधना का विशेष महत्व होता है. ऐसे में हम आपको देश-दुनिया के उन मंदिरों के बारे में बता रहे हैं, जहां नारायण के दर्शन मात्र से भक्तों के कष्ट दूर हो जाते हैं. ऐसा ही भव्य मंदिर Odisha की राजधानी भुवनेश्वर में स्थित है.
प्राचीन अनंत वासुदेव मंदिर भक्तों की आस्था के प्रमुख केंद्र में से एक है. यहां भगवान वासुदेव (कृष्ण) के साथ उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा विराजमान हैं. यह मंदिर न केवल अपनी प्राचीनता और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि महाप्रसाद की अनूठी परंपरा के लिए भी जाना जाता है.
अनंत वासुदेव मंदिर Odisha के सबसे पुराने और प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है. यह बिंदु सरोवर झील के शांत किनारे पर स्थित है. 13वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश की रानी चंद्रिका देवी ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था. मंदिर भगवान विष्णु के अनंत वासुदेव रूप को समर्पित है. मंदिर में प्रवेश करते ही भक्तों का मन मोह लेता है. ऊंचा गोपुरम (प्रवेश द्वार) विभिन्न देवी-देवताओं की नक्काशी से सजा हुआ है. मंदिर के शिखर और दीवारें कलिंग शैली की उत्कृष्ट वास्तुकला का नमूना हैं. दीवारों पर वैष्णव धर्म से जुड़ी सुंदर नक्काशियां बनी हैं जो देखने वाले को मंत्रमुग्ध कर देती हैं.
मंदिर के गर्भगृह में काले ग्रेनाइट पत्थर से बनी तीन प्रमुख मूर्तियां स्थापित हैं. बीच में भगवान कृष्ण (वासुदेव) हैं, जिनके हाथों में शंख, चक्र और गदा हैं. उनके बाएं भगवान बलराम सात फन वाले नाग की छाया में खड़े हैं. दाईं ओर देवी सुभद्रा कमल और कलश धारण किए खड़ी हैं. इन तीनों की साथ-साथ उपस्थिति इस मंदिर को विशेष बनाती है. भक्त यहां परिवार रूप में भगवान के दर्शन करते हैं.
अनंत वासुदेव मंदिर की एक बड़ी खासियत है इसका महाप्रसाद. इसे ‘अभाड़ा’ भी कहा जाता है. यह प्रसाद मिट्टी के बर्तनों और मिट्टी के चूल्हों पर पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है. देवताओं को अर्पित करने के बाद यह प्रसाद भक्तों को भोग बाजार में वितरित किया जाता है. भक्त मानते हैं कि यह प्रसाद शरीर और आत्मा दोनों को तृप्ति प्रदान करता है. पुरुषोत्तम मास में इस प्रसाद की मांग और भी बढ़ जाती है.
मंदिर चार मुख्य भागों में विभाजित है – गर्भगृह, जगमोहन, भोगमंडप और नाटमंदिर. यह मंदिर क्रॉस आकार के चबूतरे के लिए भी जाना जाता है, जो Odisha के मंदिरों में दुर्लभ है. खंभों और दीवारों पर बनी नक्काशी कई पुराण कथाओं को जीवंत करती है. 17वीं शताब्दी में मराठा शासन के दौरान मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया था.
जन्माष्टमी के समय मंदिर पूरी तरह सज जाता है. फूलों, रोशनियों और भक्ति गीतों से वातावरण भक्तिमय हो उठता है. भक्त भगवान कृष्ण को दूध, मक्खन, फल और मिठाइयां अर्पित करते हैं. पुरुषोत्तम मास में यहां विशेष पूजा-अर्चना और कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं.
आसपास के दर्शनीय स्थल पर नजर डालें तो मंदिर के पास ही प्रसिद्ध लिंगराज मंदिर है, जो भगवान शिव को समर्पित है. बीजू Patnaयक पार्क में झील के किनारे घूमना और नौका विहार करना सुखद अनुभव है. वन्यजीव प्रेमी नंदनकानन चिड़ियाघर जा सकते हैं, जहां सफेद बाघ और अन्य दुर्लभ जानवर देखने को मिलते हैं. ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट म्यूजियम में आदिवासी संस्कृति की जानकारी मिलती है.
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एमटी/डीकेपी
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