बंगाल: हिन्सा के हथियार के बल पर सत्ता….?

कितना बदल गया बंगाल….? (लेखक/ -ओमप्रकाश मेहता)

मुझे याद है…. आज से करीब सात दशक पहले एक फिल्म बनी थी, जिसका नाम था- ”जाग्रति“ इस फिल्म के सभी गीत मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) की शान राष्ट्रकवि स्व. प्रदीप जी ने लिखे थे, इसी फिल्म में एक प्रसिद्ध गीत ”आओ बच्चों तुम्हे दिखाये झांकी हिन्दुस्तान की…“ के माध्यम से बच्चों के देश के विभिन्न हिस्सों (राज्यों) की शौर्यगाथा से परिचित कराया गया था, इसी गीत में बंगाल के बारे में लिखा गया था- ”देखो ये बंगाल यहां का हर चप्पा हरियाला है, यहां का बच्चा-बच्चा अपने देश पे मरने वाला है… जन्मभूमि है यही हमारे वीर सुभाष महान की… इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की…..“
….और आज सात दशक बाद यह प्रदेश क्या से क्या हो गया, कभी सुभाषचन्द्र बोस ने यह कल्पना भी की थी कि उनका प्रदेश चुनावी हिंसा, भ्रष्टाचार, खून-खराबे और स्वार्थ की राजनीति का केन्द्र बन जाएगा? यहां से कुर्बानी, बलिदान, राष्ट्रभक्ति और नैतिकता का अपहरण आखिर किसने कर लिया? क्या इसके लिए यहां का मौजूदा माहौल जिम्मेदार नहीं है? हम पाकिस्तानी आतंकवाद का रोना अक्सर रोते रहते है, किंतु हमारे देश में नक्सली आतंकी कहां से व कैसे पैदा हुए, जो सत्ता व उस पर काबिज राजनेताओं व सेना-पुलिस (Police) के दुश्मन बने हुए है, हिंसा के इतिहास के सरदार वामपंथी कहां की उपज है? और आज जब बंगाल में चुनावी दौर चल रहा है तो वहां क्या हो रहा है? मैं इसके लिए किसी राजनेता या दल विशेष को जिम्मेदार नहीं ठहराता, किंतु आज बंगाल में जो भी हो रहा है, उसके लिए दोषी सिर्फ और सिर्फ सत्ता की हवस व आज की राजनीति है, अभी दो दिन पहले बंगाल के जिस कूचबिहार (Bihar) क्षेत्र में पांच निर्दोष को केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षाबल के जवानों ने गोलियों से भूना, उस कूचबिहार (Bihar) का अतीत में गौरवमयी इतिहास रहा है, इस क्षेत्र के मुर्शिदाबाद को कभी प्रदेश की राजधानी होने का गौरव प्राप्त था, क्या वहां की स्थिति को शांति व सूझबूझ से संभाला नहीं जा सकता था? घटना के एक दिन पहले ही मुख्यमंत्री (Chief Minister) ममता बैनर्जी ने केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षाबल (सीआईएसएफ) की भूमिका पर चिंता व्यक्त की थी और भारत में सत्तारूढ़ दल की कठपुतली बने चुनाव आयोग ने चुनावी व्यवस्था को सुचारू बनाने के बजाए उस क्षेत्र में राजनेताओं के दौरों पर प्रतिबंध लगा दिया, क्या चुनाव आयोग ने भारतीय संविधान में मुख्यमंत्री (Chief Minister) के दायित्वों, कर्तव्यों व अधिकारों का अध्ययन किया? यदि किया होता तो वह उपद्रव व हिंसा ग्रस्त प्रदेश की मुख्यमंत्री (Chief Minister) को उपद्रवी क्षेत्र में जाने से नहीं रोकता? किंतु किया क्या जाए केन्द्र में सत्तारूढ़ दल इन दिनों ”राजसूत्र यज्ञ“ जो चला रखा है और उस यज्ञ का ”घोड़ा“ इन दिनों पश्चिम बंगाल (West Bengal) में है, जिसे वहां रोकने का प्रयास किया जा रहा है और देश पर सत्तारूढ़ दल ’साम-दाम-दण्ड-भेद‘ हर तरीके से अपने घोड़े की रक्षा में जुटा है.
यहाँ मैंने ’साम-दाम-दण्ड-भेद‘ का उपयोग इसलिए भी किया क्योंकि देश में ममता जी के राजनीतिक विश्लेषक व सलाहकार प्रशांत किशोर की वायरल वीडियों को लेकर यही आशंका व्यक्त की जा रही है, उसे भाजपा ने खरीद लिया है, तभी ममता जी के साथ रहते हुए उसने मोदी के पक्ष में बयान जारी किया. जबकि प्रदेश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति अभी भी ममता के ही पाले में है, ऐसे वहां के स्थानीय मीडिया (Media) का कहना है, और इन्हीं स्थानीय मीडिया (Media) संस्थानों का कहना है कि राष्ट्रीय चैनल व अखबार इस बारे में अपनी सही नैतिकता प्रदर्शित नहीं कर रहे है. अब राज्य व राष्ट्रीय स्तरीय मीडिया (Media) माध्यमों में कौन सही है, यह तो आज से बीस दिन बाद दो मई को ही पता चलेगा, किंतु पश्चिम बंगाल (West Bengal) में होने वाले अगले चार चरणों के चुनावों को लेकर भय, चिंता और नैराश्य का वातावरण अवश्य है, क्योंकि इतिहास गवाह है कि पश्चिम बंगाल (West Bengal) में अब तक पंचायत से लेकर लोकसभा (Lok Sabha) तक कोई भी चुनाव निर्विघ्न कभी सम्पन्न नहीं हुआ, 2018 के पंचायत चुनावों में भी सौ से अधिक लोग मारे गए थे. इसलिए अगला एक पखवाड़ा चुनावी हिंसा की दृष्टि से पश्चिम बंगाल (West Bengal) के लिए काफी खतरनाक हो सकता है. अब तो हर बंगाली भी भगवान से प्रतिदिन सुख-शांति की ही प्रार्थना कर रहा है, जिसकी स्थापना वहां मुश्किल ही प्रतीत हो रही है? पता नहीं पश्चिम बंगाल (West Bengal) के बाद आगे बीस प्रदेशों में होने वाले विधानसभा चुनाव (Assembly Elections)ों का भविष्य क्या होगा? क्योंकि सत्ता की भूख ने सुख शांति को निगल जो लिया है.

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