ईरान पर कूटनीति नहीं सख्त दबाव ही कारगर, पाकिस्तान निष्पक्ष मध्यस्थ नहीं : इजरायली सीनियर फेलो डॉ बेनलेवी (आईएएनएस एक्सक्लूसिव)

तेल अवीव/New Delhi, 16 जुलाई . अमेरिका ने एक बार फिर ईरान पर हवाई हमला किया तो जवाबी कार्रवाई जारी है. इस बीच Pakistan ने कहा है कि वो दोबारा मध्यस्थता को तैयार है. इस्लामाबाद खुद को शांतिदूत के तौर पर पेश कर रहा है, लेकिन क्या दुनिया और खासकर इजरायल को उसकी भूमिका पर विश्वास है? क्या कूटनीति के जरिए समाधान संभव है? चीन किस तरह का रोल अदा कर सकता है? ऐसे ही तमाम सवालों का जवाब इजरायल के थिंक टैंक मिसगाव इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटी के सीनियर फेलो डॉ राफेल बेनलेवी ने को एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में दिया.

बेनलेवी ने Pakistan को ईरान-इजरायल विवाद में निष्पक्ष मध्यस्थ मानने से इनकार किया. बेनलेवी ने कहा, “इजरायल नहीं मानता कि Pakistan इस क्षेत्र में सफल मॉडरेटर या मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है. इजरायली इलाका हो या फिर मिडिल ईस्ट क्षेत्र रहा हो, वह हमेशा इजरायल विरोधी ताकतों के साथ खड़ा रहा है. ऐसे आंदोलनों का हिस्सा रहा है जो हमारे खिलाफ रहे हैं. वह ऐसे कई क्षेत्रीय समूहों और देशों के करीब है, जो इजरायल के प्रति शत्रुतापूर्ण रुख रखते हैं, इसलिए वह ईरान और अमेरिका या इजरायल के बीच किसी प्रभावी मध्यस्थ की भूमिका नहीं निभा सकता. इस व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष में Pakistan एक पक्ष है और वह इजरायल के विपरीत खेमे में खड़ा दिखाई देता है.”

इसके साथ ही विशेषज्ञ ने माना कि इजरायली हमलों से ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को गंभीर नुकसान पहुंचा है, लेकिन वह अब भी क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बना हुआ है. उन्होंने कहा कि मौजूदा ईरानी शासन के साथ कूटनीति कारगर नहीं हो सकती और उसे रोकने के लिए सैन्य प्रतिरोध और अधिकतम दबाव की नीति ही प्रभावी विकल्प है.

डॉ बेनलेवी ने कहा, “हालिया संघर्ष में इजरायल ने ईरान के परमाणु ठिकानों, वैज्ञानिकों और मिसाइल अवसंरचना को निशाना बनाकर उसकी सैन्य क्षमता को काफी हद तक कमजोर कर दिया है. हालांकि, ईरान के पास अब भी बड़ी संख्या में बैलिस्टिक मिसाइलें मौजूद हैं और उसके पास संवर्धित यूरेनियम भी है, जो फिलहाल भूमिगत ठिकानों में है. इसलिए दीर्घकाल में खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है.”

उन्होंने इजरायल की क्षमता का बखान करते हुए कहा कि देश ने हालिया संघर्ष में यह साबित कर दिया है कि वह किसी भी मिसाइल हमले का निर्णायक जवाब देने और जरूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई का स्तर बढ़ाने में सक्षम है. उनके अनुसार, इजरायल यदि आवश्यक समझे तो भविष्य में भी ईरान के खिलाफ इसी तरह की कार्रवाई करेगा.

ईरान के साथ बातचीत की संभावना पर उन्होंने कहा, “मौजूदा ईरानी शासन एक वैचारिक और क्रांतिकारी व्यवस्था है, जिसने हमेशा कूटनीति का इस्तेमाल केवल समय हासिल करने, प्रतिबंधों से राहत पाने और अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए किया है. यह शासन दूसरे देशों की संप्रभुता का सम्मान करने के बजाय पूरे क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है इसलिए केवल सैन्य शक्ति और कठोर दबाव ही उसे रोक सकते हैं.”

अमेरिकी नीति पर टिप्पणी करते हुए डॉ बेनलेवी ने कहा कि President डोनाल्ड ट्रंप ईरानी शासन की प्रकृति को समझते हैं और उनकी “मैक्सिमम प्रेशर” (अधिकतम दबाव) नीति इसी सोच पर आधारित है. उन्होंने कहा कि ट्रंप पूर्ण युद्ध नहीं चाहते, लेकिन यदि ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव बढ़ाता रहा या अमेरिकी हितों तथा सहयोगियों पर हमले जारी रखता है, तो अमेरिका बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई भी कर सकता है.

उन्होंने कहा कि हाल के अमेरिकी हवाई हमले ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करने के लिए किए गए हैं, जिनका इस्तेमाल वह तेल टैंकरों और पड़ोसी देशों पर हमलों में कर रहा है. हालांकि फिलहाल अमेरिका संघर्ष को सीमित रखने की कोशिश कर रहा है.

ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर उन्होंने कहा कि अमेरिका पिछले 25 वर्षों से ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने की कोशिश कर रहा है. “ट्रंप प्रशासन ऐसा कोई समझौता स्वीकार नहीं करेगा, जिससे ईरान के लिए परमाणु हथियार बनाने का रास्ता खुला रहे.” यदि आवश्यकता पड़ी तो अमेरिका और इजरायल संयुक्त रूप से फिर बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चला सकते हैं.

चीन-ईरान संबंधों पर उन्होंने कहा कि चीन कई वर्षों से ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को तकनीक, कच्चे माल और आर्थिक सहयोग के जरिए समर्थन देता रहा है. चीन ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार भी है, जिससे ईरान को आर्थिक मजबूती मिलती है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि यदि इजरायल और अमेरिका के साथ बड़ा संघर्ष होता है, तो चीन सीधे सैन्य हस्तक्षेप नहीं करेगा, बल्कि ईरान को अपने हाल पर छोड़ देगा और बाद में पुनर्निर्माण में मदद करेगा.

डॉ. बेनलेवी ने निष्कर्ष में कहा कि मध्य पूर्व की मौजूदा परिस्थितियों में ईरान को रोकने के लिए केवल कूटनीति पर्याप्त नहीं है. जब तक ईरान अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम तथा क्षेत्रीय विस्तारवादी नीति से पीछे नहीं हटता, तब तक सैन्य प्रतिरोध और कठोर आर्थिक दबाव ही सबसे प्रभावी रणनीति बनी रहेगी.

केआर/