कारगिल वॉर मेमोरियल तक पैदल यात्रा पर आयुष, बोले- सेना के बलिदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाएंगे

द्रास (लद्दाख), 25 जुलाई . उत्तर प्रदेश के कंटेंट क्रिएटर आयुष कुमार मध्येश (25) भारतीय सशस्त्र बलों के जवानों के सम्मान और कारगिल युद्ध के वीरों के बलिदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से दिल्ली के इंडिया गेट से कारगिल वॉर मेमोरियल तक पैदल यात्रा कर रहे हैं. एक महीने पहले शुरू हुई उनकी यह यात्रा अब अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुकी है. वह द्रास स्थित कारगिल युद्ध स्मारक से लगभग 30 किलोमीटर दूर मटायन में हैं.

आयुष कुमार मध्येश ने से बातचीत में बताया कि वह उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं और पिछले वर्ष ही उन्होंने यह संकल्प लिया था कि वह इंडिया गेट से कारगिल वॉर मेमोरियल तक पैदल यात्रा करेंगे. इस यात्रा के पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य भारतीय सेना के प्रति सम्मान व्यक्त करना और देश के युवाओं को कारगिल युद्ध के नायकों के बलिदान से परिचित कराना है.

उन्होंने कहा कि पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मैंने देखा कि देश में कुछ लोग भारतीय सेना पर सवाल उठा रहे थे. यह बात मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं लगी. उसी समय मैंने तय किया कि मैं कंटेंट क्रिएशन की शुरुआत भारतीय सशस्त्र बलों को श्रद्धांजलि देकर करूंगा. 26 जून को मैं दिल्ली के इंडिया गेट से निकला था. अब 30 दिन पूरे हो चुके हैं और मैं कारगिल वॉर मेमोरियल से करीब 30 किलोमीटर पहले मटायन में हूं. कल मैं कारगिल वॉर मेमोरियल पहुंचकर कारगिल के वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करूंगा.

यात्रा के दौरान आयुष प्रतिदिन एक कारगिल योद्धा की कहानी लोगों तक पहुंचा रहे हैं. उन्होंने कहा कि मैं जिस जेनरेशन से आता हूं, उसमें कई लोगों को यह तक नहीं पता कि कारगिल युद्ध कब हुआ था. मैंने बहुत से लोगों से बात की है. मुझे लगता है कि हमारी इतिहास की किताबों में इन वीरों की कहानियों को और प्रमुखता से पढ़ाया जाना चाहिए. जब तक हम अपने इतिहास को नहीं जानेंगे, तब तक अपने भविष्य को सही दिशा नहीं दे पाएंगे. यात्रा के अनुभव साझा करते हुए आयुष ने बताया कि उन्होंने दिल्ली से Haryana, पंजाब, Himachal Pradesh, जम्मू, कश्मीर और श्रीनगर होते हुए लद्दाख तक का सफर पैदल तय किया है. यात्रा बेहद चुनौतीपूर्ण रही, लेकिन रास्ते में लोगों का स्नेह और सहयोग उन्हें लगातार प्रेरित करता रहा.

उन्होंने कहा कि जब भी लोगों को पता चला कि मैं भारतीय सशस्त्र बलों के सम्मान में यह यात्रा कर रहा हूं, सभी ने मेरा बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया. पंजाब, जम्मू और कश्मीर में मुझे बेहद अच्छे लोग मिले. कश्मीर में तो मुझे होटल नहीं मिला, तब एक स्थानीय व्यक्ति ने अपने घर पर ठहराया. वह मेरे जीवन के सबसे यादगार अनुभवों में से एक है. कश्मीर को लेकर जो भी नाकारात्मक बातें सामने आती है, हर पर आंख बंद करके विश्वास मत कीजिए. वहां जाकर खुद देखिए. वहां के लोग बेहद अच्छे हैं.

लद्दाख के कठिन मौसम का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यहां पहुंचकर उन्हें सैनिकों के त्याग का वास्तविक एहसास हुआ. मैं करीब 3,200 मीटर की ऊंचाई पर हूं. यहां कुछ देर पैदल चलने पर ही सांस लेने में दिक्कत होने लगती है. यहां का मौसम बेहद कठिन है. मुझे श्रीनगर से जैकेट खरीदनी पड़ी क्योंकि तापमान काफी नीचे आ गया था. Haryana और पंजाब में जहां 44 से 45 डिग्री सेल्सियस की गर्मी थी, वहीं लद्दाख में रात का तापमान 2 से 3 डिग्री तक पहुंच गया. सर्दियों में यहां 12-12 फीट तक बर्फ जम जाती है. ऐसे माहौल में हमारे सैनिक महीनों और कई बार वर्षों तक देश की रक्षा करते हैं.

उन्होंने कहा कि घर से निकले अभी सिर्फ एक महीना हुआ है और उन्हें अपने परिवार की याद आने लगी है, जबकि भारतीय सैनिक छह-छह महीने, एक-एक साल और कई बार उससे भी अधिक समय तक परिवार से दूर रहकर सीमाओं की रक्षा करते हैं. उनके अनुसार देशवासियों को सैनिकों के त्याग और समर्पण का सम्मान करना चाहिए.

युवाओं से खास अपील करते हुए आयुष ने कहा कि इस बार मैं अकेला आया हूं, लेकिन अगली बार चाहता हूं कि मेरी पीढ़ी के कम से कम 10 युवा और मेरे साथ यहां आएं. हमारी आर्म्ड फोर्सेस हर सम्मान की हकदार हैं. Government से सवाल पूछना लोकतंत्र का हिस्सा है और पूछना भी चाहिए, लेकिन अपनी सशस्त्र सेनाओं पर कभी सवाल नहीं उठाना चाहिए. वे बेहद कठिन और जानलेवा परिस्थितियों में देश की सुरक्षा करते हैं.

उन्होंने आगे बताया कि भविष्य में वह मनाली-पांग मार्ग से दोबारा कारगिल आने की योजना बना रहे हैं, ताकि अधिक से अधिक युवा इस ऐतिहासिक स्थल और भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस को करीब से देख सकें. यह यात्रा केवल एक पैदल अभियान नहीं, बल्कि देश के वीर सैनिकों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ने का एक प्रयास है.