
वॉशिंगटन, 22 जुलाई . India और अमेरिका एक जॉइंट अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट (निसार) ने अब अपने दोनों रडार उपकरणों से जुटाया गया डेटा सार्वजनिक करना शुरू कर दिया है. इससे वैज्ञानिकों को पृथ्वी पर हो रहे बदलावों को पहले से बेहतर तरीके से देखने और समझने में मदद मिलेगी. इस डेटा में अंटार्कटिका का एक ऐसा इलाका भी दिखा है, जिसकी आकृति देखने पर हमिंगबर्ड जैसी लगती है.
नासा-इसरो सिंथेटिक ऐपर्चर रडार (निसार) सैटेलाइट का डेटा 20 जुलाई से आम लोगों और वैज्ञानिकों के लिए उपलब्ध कराया गया. नासा ने बताया कि अमेरिका और India की टीमें अब इसके एल-बैंड और एस-बैंड रडार से मिलने वाले प्रोसेस किए गए डेटा को लगातार जारी करती रहेंगी.
इस डेटा की मदद से वैज्ञानिक जमीन और बर्फ की हलचल पर नजर रख सकेंगे, जंगलों और दलदली इलाकों की निगरानी कर सकेंगे और भूकंप, भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं के बाद हालात को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे.
यह डेटा ऐसे समय जारी किया गया है जब ‘निसार’ की लॉन्चिंग की पहली सालगिरह आने वाली है. इस सैटेलाइट को 30 जुलाई 2025 को India के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया था. तब से वैज्ञानिक इसकी मशीनों को ठीक से कैलिब्रेट करने, डेटा प्रोसेसिंग को बेहतर बनाने और लगभग पूरी धरती की जमीन तथा बर्फ से ढके इलाकों की हर 12 दिन में दो बार निगरानी कर रहे हैं.
Tuesday को नासा ने एक शुरुआती तस्वीर भी जारी की. इसमें पूर्वी अंटार्कटिका का नुनातक जतेरजावशिज्जा नाम का पहाड़ दिखाई देता है, जिसके चारों ओर बर्फ उत्तर-पूर्व दिशा में समुद्र की तरफ बह रही है. इस इलाके की टूटी-फूटी बर्फ का आकार देखने पर ऐसा लगता है जैसे कोई हमिंगबर्ड उड़ रही हो.
जब ग्लेशियर इस पहाड़ के चारों ओर से गुजरता है, तो जमीन की बनावट की वजह से बर्फ पर दबाव पड़ता है. इससे बर्फ में गहरी दरारें बन जाती हैं. रडार तस्वीर में ये दरारें हरे रंग की तेज रेखाओं के रूप में दिखाई देती हैं, जबकि चिकनी बर्फ मैजेंटा रंग में नजर आती है.
नासा की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी में सिग्नल विश्लेषण इंजीनियर सेओंगसू जियोंग ने कहा, “सबसे पहले तो यह बेहद खूबसूरत तस्वीर है. इसमें कई ऐसे बारीक विवरण दिखाई देते हैं, जिनसे यह समझने में मदद मिलती है कि ग्लेशियर कैसे आगे बढ़ रहा है. इसके अलावा, रडार बर्फ और हिम की परतों के अंदर तक देख सकता है, इसलिए ‘निसार’ हमें अंटार्कटिका की बर्फ के ऐसे गुण दिखाता है जिन्हें सामान्य कैमरों से नहीं देखा जा सकता.”
उन्होंने कहा कि ‘निसार’ की मदद से हम सतह के नीचे छिपी चीजों को भी देख पा रहे हैं. यह तस्वीर अगस्त 2025 में एल-बैंड रडार से जुटाए गए डेटा से बनाई गई थी. उस समय अमेरिका और India की टीमें सैटेलाइट की प्रणाली का परीक्षण कर रही थीं.
तस्वीर में दिखने वाले अलग-अलग रंग इस बात को दर्शाते हैं कि माइक्रोवेव सिग्नल बर्फ से टकराने के बाद कैसे वापस लौटे. जहां सतह ज्यादा चिकनी थी, वहां से लौटने वाले सिग्नल मैजेंटा रंग में दिखाई दिए. वहीं, जहां बर्फ के अंदर या दरारों जैसी ऊबड़-खाबड़ जगहों से सिग्नल बिखरे, वे हिस्से हरे रंग में नजर आए. जिन जगहों पर दोनों तरह के सिग्नल एक साथ मिले, वे सफेद रंग में दिखाई दिए.
इसरो के Ahmedabad स्थित स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर ने ‘भूनिधि’ पोर्टल के जरिए एस-बैंड डेटा जारी करना शुरू कर दिया है. वहीं, अमेरिका की तरफ से 17 जून से जुटाए गए कैलिब्रेटेड एल-बैंड डेटा को लगातार उपलब्ध कराया जा रहा है. इससे पहले जनवरी में कुछ नमूना डेटा और फरवरी में हजारों प्री-कैलिब्रेटेड डेटा फाइलें जारी की गई थीं.
यह मिशन हर दिन कई दर्जन टेराबाइट वैज्ञानिक डेटा तैयार करता है. सैटेलाइट दक्षिणी ध्रुव के पास से लेकर उत्तरी गोलार्ध में 77.5 डिग्री अक्षांश तक के इलाकों को स्कैन करता है. इसमें लगा 12 मीटर चौड़ा ड्रम के आकार का रडार रिफ्लेक्टर अब तक नासा की ओर से अंतरिक्ष में भेजा गया सबसे बड़ा रडार एंटीना रिफ्लेक्टर है.
‘निसार’ नासा और इसरो का विकसित किया गया पहला सैटेलाइट मिशन है. यह India और अमेरिका के बीच कई वर्षों से चल रहे अंतरिक्ष सहयोग का हिस्सा है. इससे पहले नासा के उपकरण India के चंद्रयान-1 मिशन में भी इस्तेमाल किए गए थे.
सिंथेटिक अपर्चर रडार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बादलों के बीच और रात के अंधेरे में भी साफ जानकारी जुटा सकता है. सामान्य कैमरे ऐसा नहीं कर सकते. इसी वजह से इसका इस्तेमाल जमीन में धीरे-धीरे होने वाले बदलावों के साथ-साथ भूकंप, भूस्खलन, बाढ़ और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं के बाद हुए नुकसान का पता लगाने के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है.
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एवाई/डीकेपी
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