ससुराल मेरी है और मजे तुम उड़ाते हो, जब बड़े भाई ने अटल बिहारी वाजपेयी से गोरखपुर जाने के बहाने खोजने पर ली थी चुटकी

New Delhi, 15 अगस्त . अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ नाम से ही नहीं, बल्कि कर्म और विचार, दोनों से अटल थे. मतांतर को स्वीकार करने और मनांतर को सिरे से नकारने वाले अटल का सार्वजनिक जीवन बेदाग और प्रेरणादायक रहा. उन्होंने सौंपी गई हर जिम्मेदारी को पूर्ण निष्ठा, ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ निभाया.

कोमल हृदय के बावजूद उनके निर्णयों में अद्भुत Political दृढ़ता दिखाई देती थी. देश के आंतरिक मुद्दे हों या वैश्विक मंच पर India की बात अटल बिहारी वाजपेयी ने हमेशा बेबाकी, स्पष्टता और गरिमा के साथ अपने विचार रखे. इन्हीं विशेषताओं की वजह से उन्हें न सिर्फ अपने दल में, बल्कि सभी Political दलों और समाज के हर वर्ग से जीवनभर अपार सम्मान मिला.

एक कवि, राजनीतिज्ञ, वक्ता होने के साथ-साथ एक भावुक व्यक्तित्व भी थे. उनके Political जीवन से इतर आज बात उनके निजी जीवन की बताते हैं, जो गोरखपुर से जुड़ी हुई हैं.

1940 में वे अपने बड़े भाई प्रेम बिहारी वाजपेयी की शादी में पहली बार गोरखपुर सहबाला बनकर आए थे. गोरखपुर के मथुरा प्रसाद दीक्षित की बेटी राजेश्वरी से अटलजी के बड़े भाई प्रेम बिहारी की शादी हुई थी.

अटल बिहारी वाजपेयी के मजाकिया अंदाज से सभी भली-भांति परिचित हैं. एक रिश्तेदार सुनील दीक्षित ने एक इंटरव्यू में बताया, “वे घर की बड़ी बहू, जो बांग्ला जानती थी, को मजाक में ‘खालिदा जिया’ कहते थे. जब वे यहां पर खाना खाने आए तो ऊंचे पद पर होने के बावजूद खुद ही हाथ साफ करते थे. कभी बहू से हाथ नहीं धुलवाए. वही कहते थे, ‘खालिदा जिया’ आप रहने दो.

जब भी अटल बिहारी वाजपेयी गोरखपुर जाया करते थे, खूब खातिरदारी हुआ करती थी. रिश्ते के साले बृज नारायण दीक्षित ने एक इंटरव्यू में कहा था, “वे जब भी आते थे, खूब खाते-पीते थे. वे खुद ही ठंडाई बनाने के लिए चीजें पीसते थे और सभी को पिलाते भी थे. वे खूब गप्पे लड़ाते थे.”

रिश्तेदार सुनील दीक्षित ने इंटरव्यू में बताया कि अटल को खाने-पीने में कढ़ी बहुत पसंद थी. वे कड़ी-चावल अधिक पसंद करते थे. रिश्तेदार सुनील ने बताया, “आज भी उनकी जन्मतिथि के अवसर पर हम लोग सह-परिवार कड़ी-चावल अधिक बनाते हैं.”

असल में बृज नारायण दीक्षित, अटल बिहारी वाजपेयी के भाई के साले थे. इस नाते वे अटलजी को भी जीजा कहा करते थे.

करीबी लोगों का यह भी कहना रहा कि अटल गोरखपुर आने का कोई बहाना छोड़ते नहीं थे. खुद एक बार उनके बड़े भाई प्रेम बाजपेयी ने मजाकिया अंदाज में अटल से बोला था कि ‘ससुराल मेरी है और मजे तुम उड़ाते हो. दामाद मैं और मौज तुम्हारी.”

वाजपेयी एक बेहद मिलनसार और खुले दिल के इंसान थे. राजनीति में होने के बाद भी वे दलगत भावनाओं से ऊपर उठकर सबसे संबंध रखते थे. उनके इसी मिलनसार स्वभाव और हास-परिहास की शैली के कारण विपक्ष के नेता भी उनके मुरीद हुआ करते थे.

बृज नारायण दीक्षित ने बताया था, “वे (अटलजी) गोरखपुर आया करते थे. जब हम स्कूल में पढ़ते थे तो वे हमें समझाते थे कि खूब मेहनत से पढ़ना. वे हमेशा चटकीली बातें करते थे और कविताएं सुनाते थे. हमारा संबंध जीजा-साले का था. जब भी वे गोरखपुर आते थे, तो सभी से मुलाकात किया करते थे और हालचाल पूछते थे.”

सुनील दीक्षित ने यादें ताजा करते हुए इंटरव्यू में कहा, “जिस तरह देश के लोग थे. अटल बिहारी वाजपेयी हम रिश्तेदारों को भी उन्हीं में गिनते थे, हालांकि पारिवारिक संबंध होने पर जब वे गोरखपुर आते थे तो मिलने के लिए बुला लेते थे. उस समय वे कोई भी बात Political तौर पर नहीं करते थे. सिर्फ घरेलू बातें किया करते थे.”

अटल बिहारी वाजपेयी ने तीन बार India के Prime Minister के रूप में काम किया और चार दशकों के अपने शानदार संसदीय करियर में, वे नौ बार Lok Sabha और दो बार राज्यसभा के लिए चुने गए. ग्वालियर में एक साधारण परिवार से निकलकर India के सर्वोच्च पद तक पहुंचने वाले वाजपेयी को राष्ट्र के प्रति उनकी निस्वार्थ सेवा के लिए 1992 में पद्म विभूषण मिला और 2015 में उन्हें India का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, India रत्न से सम्मानित किया गया.

वाजपेयी ने लोकतांत्रिक आदर्शों, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक समानता का मुखर समर्थन किया. उन्होंने Prime Minister के रूप में सुशासन और आर्थिक विकास को प्राथमिकता देते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग और ग्रामीण सड़कों के निर्माण को प्राथमिकता दी, दूरसंचार का विस्तार किया और बुनियादी ढांचे में सुधार किया. उनकी विरासत, शासन के India के दृष्टिकोण और पारदर्शिता, जवाबदेही और कुशलता व नागरिक-केंद्रित सेवा वितरण पर ध्यान केंद्रित करने में मार्गदर्शन करती है.

16 अगस्त 2018 को 93 साल की उम्र में अटल बिहारी वाजपेयी का लंबी बीमारी के बाद दिल्ली एम्स में निधन हुआ.

डीसीएच/