
गुवाहाटी, 30 जुलाई . मेघालय हाई कोर्ट ने 27 साल के एक व्यक्ति के खिलाफ ‘प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस’ (पॉक्सो) एक्ट के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि उस व्यक्ति ने पीड़िता से शादी कर ली थी, वे कई सालों से साथ रह रहे थे, और अपनी चार साल की बेटी की परवरिश कर रहे थे.
डिवीजन बेंच ने आरोपी और पीड़िता की संयुक्त याचिका को मंजूरी देते हुए यह आदेश दिया. इस याचिका में 2021 में री-भोई महिला Police स्टेशन में दर्ज First Information Report और री-भोई में स्पेशल जज (पॉक्सो) के सामने चल रही कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई थी.
याचिका के अनुसार, First Information Report तब दर्ज की गई थी जब लड़की नाबालिग और गर्भवती थी. बालिग होने के बाद, उसने आरोपी के साथ रहने का फैसला किया और इस साल मार्च में नोंगपोह में मैरिज रजिस्ट्रार के सामने शादी कर ली.
कोर्ट ने हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी के सेक्रेटरी की रिपोर्ट पर भी विचार किया, जिसमें पुष्टि हुई कि यह जोड़ा अपनी बेटी के साथ रह रहा था.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि महिला ने चल रहे आपराधिक मामले के कारण लेबोरेटरी टेक्नोलॉजी में डिप्लोमा कोर्स छोड़ दिया था.
उसने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करने या लॉ की डिग्री लेने की इच्छा जताई और सिलाई में वोकेशनल ट्रेनिंग में भी रुचि दिखाई.
रिपोर्ट में दर्ज किया गया कि उसने अपनी मर्जी से कहा कि उसे अपने पति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है.
मामले को रद्द करते हुए हाई कोर्ट ने ‘शालेनबोर वाहतांग बनाम मेघालय राज्य’ में अपने पहले के फैसले का हवाला दिया. इस फैसले में माना गया था कि राज्य में किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने रिश्ते आम हैं और ऐसे मामलों पर फैसला करते समय अदालतों को खास हालात पर विचार करना चाहिए.
बेंच ने कहा कि हालांकि पॉक्सो एक्ट के तहत अपराधों को समाज के खिलाफ अपराध माना जाता है, लेकिन न्यायिक फैसलों को सामाजिक हकीकत से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता.
कोर्ट ने कहा कि जहां कोई जोड़ा कानूनी रूप से शादीशुदा हो या बच्चों के साथ रह रहा हो, वहां पति को जेल भेजने से न केवल पीड़िता पर, बल्कि बच्चे की भलाई पर भी बुरा असर पड़ सकता है.
यह मानते हुए कि हर मामले का आकलन उसके अपने तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए, कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ट्रायल जारी रखने से कोई फायदा नहीं होगा और First Information Report और लंबित कार्यवाही, दोनों को रद्द कर दिया.
हाई कोर्ट ने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि महिला और उसकी बेटी को लागू केंद्रीय और राज्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिले. साथ ही, कोर्ट ने री-भोई में डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी और डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड प्रोटेक्शन ऑफिसर को निर्देश दिया कि वे आठ सप्ताह के भीतर उसकी उच्च शिक्षा या वोकेशनल ट्रेनिंग की व्यवस्था करें.
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एससीएच/डीकेपी
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