कोलकाता, 4 अप्रैल . लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में मालदा-दक्षिण लोकसभा क्षेत्र को बरकरार रखना कांग्रेस के लिए ‘करो या मरो’ जैसा है.

2009 के बाद से, मालदा-दक्षिण के मतदाताओं ने लगातार तीन बार पार्टी के मौजूदा लोकसभा सदस्य अबू हासेम खान चौधरी को चुनकर कांग्रेस को कभी निराश नहीं किया है.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में मालदा जिले के कांग्रेस नेता और पूर्व रेल मंत्री स्वर्गीय अबू बरकत अताउर गनी खान चौधरी के छोटे भाई ने केवल 8,226 वोटों के मामूली अंतर से हराया था.

2019 में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार मोअज्जम हुसैन कुल मतदान का केवल 27 प्रतिशत वोट हासिल कर उपविजेता रहे थे.

इस बार अबू हासेम खान चौधरी अपनी उम्र संबंधी बीमारी के कारण चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. उनकी जगह पर कांग्रेस नेतृत्व ने उनके बेटे ईशा खान चौधरी को मैदान में उतारा है.

अगर ऑल इंडिया सेक्युलर फ्रंट (एआईएसएफ) अपना उम्मीदवार उतारती है तो इस अल्पसंख्यक बहुल निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस के लिए मुश्किल हो जाएगी. अबू हासेम खान चौधरी ने एआईएसएफ नेतृत्व से निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने से परहेज करने का अनुरोध किया है.

अनुरोध पत्र में उन्होंने कहा कि एआईएसएफ अगर चुनाव में उतरती है तो भाजपा को ही मदद करेगी. हालांकि, एआईएसएफ नेतृत्व की ओर से अभी तक कोई आश्वासन नहीं आया है.

भाजपा ने अपनी उम्मीदवार श्रीरूपा मित्रा चौधरी को फिर से उतारा है, जो वर्तमान में इंग्लिश बाजार से पार्टी विधायक हैं.

तृणमूल कांग्रेस ने शाहनवाज अली रेहान को चुनावी मैदान में उतारा है. ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से डी-फिल की पढ़ाई कर रहे इतिहासकार रेहान को पहले से ही मालदा जिले में सत्तारूढ़ पार्टी में अंदरूनी कलह की मार महसूस होने लगी है.

अपने नामांकन की घोषणा के तुरंत बाद, उन्होंने अपनी पार्टी के नेता और कार्यकर्ताओं के एक वर्ग द्वारा तोड़फोड़ की आशंका व्यक्त की. उन्होंने मीडियाकर्मी से कहा कि ऐसे उदाहरण हैं कि पार्टी पार्षद चुनाव से पहले प्रतिद्वंद्वी ताकतों को गुप्त समर्थन दे रहे हैं.

मालदा-दक्षिण में मुकाबला मुख्य रूप से कांग्रेस और भाजपा के बीच केंद्रित रहेगा. भाजपा अपने पक्ष में बहुमत वोटों के एकजुट होने पर निर्भर है जो 2019 के लोकसभा चुनावों में पहले ही स्पष्ट हो गया था.

एफजेड/