
New Delhi, 1 जुलाई . India की समुद्री सोच अब एक बड़े नेतृत्व वाले दृष्टिकोण में बदल चुकी है. इसकी शुरुआत ‘क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास’ (सागर) की सोच से हुई थी और अब यह ‘क्षेत्रों के पार सुरक्षा और विकास के लिए आपसी और समग्र प्रगति’ (महासागर) तक पहुंच गई है. यह सोच जापान के ‘मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत’ (एफओआईपी) ढांचे से भी मेल खाती है, जैसा कि जापान की Prime Minister साने ताकाइची ने खुद अपने एक हालिया लेख में कहा है.
दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की ये पहल मिलकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक लोकतांत्रिक साझेदारी को दिखाती हैं, जिसमें सुरक्षा के साथ विकास और मजबूत जवाबी क्षमता के साथ सभी को साथ लेकर चलने की सोच शामिल है.
आज की अनिश्चित दुनिया में India और जापान को भरोसा है कि उनकी मिलती-जुलती सोच सिर्फ समुद्री सुरक्षा को मजबूत नहीं करेगी, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों को भी अपनी राह खुद चुनने और आगे बढ़ने में मदद करेगी.
हिंद महासागर क्षेत्र (आईओआर) के लिए India की नीति को लेकर Prime Minister Narendra Modi ने पहली बार मार्च 2015 में ‘सागर’ की सोच सामने रखी थी. यह मौका था जब उन्होंने मॉरीशस में कोलकाता के गार्डन रीच शिपबिल्डर्स द्वारा बनाए गए ऑफशोर पेट्रोल पोत बराकुडा को शामिल किया था.
‘सागर’ का उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समृद्धि बनाए रखना था.
Prime Minister मोदी ने ‘सागर’ को India की उस जिम्मेदारी के रूप में बताया था, जिसमें India ‘सुरक्षा देने वाले भरोसेमंद साथी’ की भूमिका निभाएगा और समुद्री मामलों में विश्वास, पारदर्शिता और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान को बढ़ावा देगा.
इसके दस साल बाद, मार्च 2025 में जब Prime Minister मोदी फिर से मॉरीशस गए, तो उन्होंने ‘महासागर’ की शुरुआत की. यह पहले के दृष्टिकोण का विस्तार है, जिसमें India सिर्फ हिंद महासागर तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों के लिए एक नेतृत्वकारी भूमिका निभाना चाहता है.
‘महासागर’ ऐसी सोच को आगे बढ़ाता है जिसमें सुरक्षा के साथ विकास, व्यापार और पर्यावरण की स्थिरता को भी महत्व दिया गया है.
दिलचस्प बात यह है कि India की कई भाषाओं में ‘सागर’ का मतलब समुद्र होता है, जबकि ‘महासागर’ का अर्थ बड़ा समुद्र होता है.
इस नाम का इस्तेमाल यह दिखाता है कि India की सोच अब सिर्फ हिंद महासागर क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक वैश्विक समुद्री दृष्टिकोण की ओर बढ़ रही है. इसमें खास ध्यान ग्लोबल साउथ के देशों पर है, जैसा कि India की थाईलैंड में पूर्व राजदूत सुचित्रा दुरई ने पहले भी बताया था.
उनके अनुसार, Prime Minister मोदी की मॉरीशस, मालदीव, त्रिनिदाद और टोबैगो, घाना और फिलीपींस जैसी देशों के साथ बातचीत और यात्राएं ‘महासागर’ की सोच से जुड़ी हुई हैं.
वहीं, Prime Minister साने ताकाइची के लेख में भी उनकी ‘एफओआईपी’ (मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत) की सोच को Prime Minister Narendra Modi की पहल के साथ जोड़ा गया है.
ताकाइची के अनुसार, वास्तव में एक स्वतंत्र और खुला क्षेत्र वह नहीं है, जहां सिर्फ बड़े देशों को आजादी मिले, बल्कि ऐसा क्षेत्र होना चाहिए जहां हर देश बिना किसी बाहरी दबाव के अपनी इच्छा से अपनी राह चुन सके.
उन्होंने India को एक बेहद जरूरी साझेदार बताया और कहा कि India एक समुद्री देश है जिसने क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने और आसपास के देशों को मजबूत बनाने के लिए ठोस कदम उठाए हैं.
उनकी बातों से यह साफ होता है कि दोनों देशों की सोच में समानता है. जापान की एफओआईपी नीति जहां कानून के शासन और समुद्र में आवाजाही की स्वतंत्रता पर जोर देती है, वहीं India की ‘महासागर’ सोच इसमें विकास का पहलू भी जोड़ती है.
मिलकर ये दोनों पहल चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) और हिंद महासागर में उसकी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति के मुकाबले एक लोकतांत्रिक विकल्प पेश करती हैं.
हिंद-प्रशांत क्षेत्र 21वीं सदी का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र बन चुका है. दक्षिण चीन सागर में चीन की सैन्य गतिविधियां हों या दक्षिण एशिया में बुनियादी ढांचे के जरिए उसका बढ़ता प्रभाव, इससे छोटे देशों में चिंता बढ़ी है.
अमेरिका जैसा प्रभावशाली देश भी अपनी जिम्मेदारियों और नीतियों को नए हालात के हिसाब से फिर से तय कर रहा है. ऐसे समय में India और जापान जैसे मध्यम स्तर की शक्तियों के लिए आगे आने का मौका बनता है.
India के लिए ‘महासागर’ उसे एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित करने में मदद करेगा, जहां सुरक्षा की मजबूती के साथ-साथ सहयोग और भरोसे की ताकत पर भी ध्यान रहेगा. वहीं जापान के लिए ‘एफओआईपी’ यह सुनिश्चित करता है कि लोकतांत्रिक मूल्य और समुद्री रास्तों की स्वतंत्रता क्षेत्रीय व्यवस्था का अहम हिस्सा बने रहें.
पूरे ग्लोबल साउथ के लिए ‘महासागर’ और ‘एफओआईपी’ चीन पर निर्भरता के बजाय साझेदारी और अपने फैसले खुद लेने का एक विकल्प देते हैं.
India और जापान की दोस्ती का इतिहास काफी पुराना है, जिसमें सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों की मजबूत भूमिका रही है.
हाल के वर्षों में यह रिश्ता आगे बढ़कर एक मजबूत और उद्देश्यपूर्ण साझेदारी में बदल गया है.
क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोनों देशों के संबंधों में एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर (एएजीआर) जैसी पहलें और रक्षा सहयोग के क्षेत्र में क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग (क्वाड) जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं, जिसमें अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं.
‘एएजीआर’ के तहत India और जापान पहले से ही बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और कुछ अफ्रीकी देशों में परियोजनाओं पर साथ काम कर रहे हैं.
जैसे-जैसे जापान की ‘एफओआईपी’ और India की ‘महासागर’ सोच एक-दूसरे के करीब आ रही हैं, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग का एक नया रास्ता बन सकता है. ऐसा रास्ता जिसमें सुरक्षा के साथ विकास और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था के साथ सभी को साथ लेकर चलने की सोच शामिल हो.
अनिश्चितता से भरी आज की दुनिया में India को उम्मीद है कि उसकी यह विस्तृत सोच न सिर्फ समुद्री सुरक्षा को मजबूत करेगी, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों का भरोसा भी जीतेगी.
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एवाई/डीकेपी
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