केसी वेणुगोपाल ने चर्चों से एफसीआरए के संशोधित नियमों में कानूनी राहत की मांग की

New Delhi/कोच्चि, 25 जून . केंद्र Government द्वारा हाल ही में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) के नियमों में किए गए संशोधन का विरोध जोर पकड़ रहा है. कांग्रेस और ईसाई चर्च संगठन इस कदम के खिलाफ अलग-अलग Political और कानूनी चुनौतियां पेश कर रहे हैं.

कांग्रेस महासचिव और सांसद केसी वेणुगोपाल ने Prime Minister Narendra Modi को पत्र लिखकर संशोधन को तत्काल वापस लेने की मांग की है. उनका आरोप है कि संशोधित नियम अल्पसंख्यक समुदायों और संस्थानों के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं.

उन्होंने तर्क दिया है कि ये बदलाव विदेशी अंशदान पर निर्भर संगठनों के लिए नई बाधाएं खड़ी कर सकते हैं और उनके प्रभावी ढंग से कार्य करने की क्षमता को कमजोर कर सकते हैं.

संसद में भी इस मुद्दे पर जोरदार चर्चा होने की संभावना है, और उम्मीद है कि आगामी सत्र में इंडिया ब्लॉक इस संशोधन का विरोध करने के लिए एक समन्वित रणनीति पर चर्चा करेगा.

विपक्षी दलों का कहना है कि नए प्रावधानों से अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा संचालित शैक्षणिक, धर्मार्थ और सामाजिक सेवा संस्थानों पर असमान रूप से प्रभाव पड़ सकता है.

आलोचना बढ़ने के बावजूद, केंद्र Government ने स्पष्ट कर दिया है कि वह संशोधन को वापस लेने पर विचार नहीं कर रही है.

सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह संशोधन किसी विशेष समुदाय को लक्षित नहीं करता है और इसका एकमात्र उद्देश्य विदेशी निधियों के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करना है.

इस विवाद को कानूनी आयाम देते हुए, ईसाई चर्चों के एक सामूहिक मंच एसीटीएस ने संशोधन को अदालत में चुनौती देने का फैसला किया है.

एसीटीएस के अध्यक्ष बिशप डॉ. ओम्मन जॉर्ज की अध्यक्षता में हुई एक नेतृत्व बैठक में संशोधित नियमों के खिलाफ न्यायपालिका में जाने का संकल्प लिया गया, जिसमें तर्क दिया गया कि ये नियम विदेशी वित्तपोषण पर निर्भर स्वयंसेवी संगठनों, सामुदायिक निकायों और सामाजिक आंदोलनों के कामकाज को गंभीर रूप से प्रभावित करेंगे.

एसीटीएस के महासचिव जॉर्ज सेबेस्टियन ने कहा कि उन्होंने संबंधित अदालतों में कानूनी अपीलें दायर करना शुरू कर दिया है.

संगठन ने 28 जून को विरोध दिवस घोषित किया है, जिसके तहत केरल भर के गिरजाघरों और सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शन और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे.

कानूनी कार्रवाई की आशंका और विपक्षी दलों द्वारा संसद में इस मुद्दे को उठाने की तैयारी के बीच, एफसीआरए संशोधन नियामक निगरानी, ​​अल्पसंख्यक अधिकारों और नागरिक समाज संगठनों की स्वायत्तता पर बहस में एक नया विवाद का मुद्दा बनकर उभर रहा है.

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