
श्रीनगर, 26 जुलाई . Prime Minister Narendra Modi ने ‘मन की बात’ के हालिया एपिसोड में कश्मीर की पारंपरिक ‘वाघू’ चटाई को फिर से बढ़ावा देने का जिक्र किया. इसके बाद स्थानीय कारीगरों ने आभार जताते हुए कहा कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उनके काम को राष्ट्रीय स्तर पर इतनी पहचान मिलेगी.
से बात करते हुए कश्मीरी कारीगर तंजिला हुसैन ने कहा कि सबसे पहले मैं Prime Minister Narendra Modi का शुक्रिया अदा करना चाहती हूं कि उन्होंने हमें अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में जिक्र करने लायक समझा. मैं पिछले दो-तीन साल से यह काम कर रही हूं, जबकि मेरे घर के बड़े-बुजुर्ग लंबे समय से इससे जुड़े रहे हैं.
एक और कारीगर गुलाम हुसैन ने कहा कि मैं आज बहुत खुश हूं. मैंने कभी नहीं सोचा था कि हमारे काम को इतनी पहचान मिलेगी. हमारा परिवार पीढ़ियों से ‘वाघू’ क्राफ्ट से जुड़ा हुआ है और हमने कई चुनौतियों के बावजूद इस पारंपरिक कला को बचाने के लिए कड़ी मेहनत की है.
पीएम मोदी ने कश्मीर की पारंपरिक ‘वाघू’ चटाई को फिर से लोकप्रिय बनाने की बात की. उन्होंने सदियों पुरानी, पर्यावरण के अनुकूल इस कला को घाटी का एक अनोखा सांस्कृतिक प्रतीक बताया और इसे पुनर्जीवित करने के प्रयासों की सराहना की.
अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ की 136वीं कड़ी में Prime Minister ने कहा कि जब किसी के पास हुनर और कुछ हासिल करने का जुनून हो, तो हर रास्ता आसान हो जाता है. कश्मीर की पारंपरिक ‘वाघू’ चटाई को लेकर किए जा रहे प्रयासों में इसकी झलक साफ दिखती है.
उन्होंने बताया कि यह चटाई बनाने की परंपरा बहुत पुरानी है और इसे सरकंडे और धान के पुआल से बनाया जाता है. उन्होंने बताया कि इसकी प्रक्रिया कश्मीर के दलदली इलाकों से घास और सरकंडे काटने से शुरू होती है. धूप में सुखाने और छांटने के बाद हाथ से बुनाई का काम शुरू होता है.
पीएम मोदी ने कहा कि दो कारीगरों को एक चटाई पूरी करने में लगभग चार दिन लगते हैं. उन्होंने कहा, “यह चटाई अनोखी और पर्यावरण के अनुकूल है. इसकी एक बड़ी खासियत यह है कि यह गर्मियों में ठंडक और सर्दियों में गर्माहट देती है. पहले यह हर कश्मीरी घर में मिलती थी, लेकिन पिछले कुछ सालों में इसका इस्तेमाल कम हो गया था.”
Prime Minister ने श्रीनगर की एक पिता-पुत्री की जोड़ी की इस पारंपरिक कला को पुनर्जीवित करने के उनके समर्पण के लिए सराहना की. इसी बीच, श्रीनगर के गुलाम हुसैन जी और उनकी बेटी तंज़िला जी ने एक संकल्प लिया. दोनों ने ‘वाघू’ कला को फिर से जीवित करने के लिए खुद को समर्पित कर दिया. गुलाम हुसैन बहुत साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं. उन्हें इस काम में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा. फिर भी ‘वाघू’ को बचाने का उनका संकल्प अडिग रहा. और देखते ही देखते, कई लोग इस पहल से जुड़ने लगे.
उन्होंने आगे कहा कि गुलाम हुसैन ने इस कला को काफी आगे बढ़ाया और उन्हें अपने मिशन के लिए स्थानीय Government का समर्थन भी मिला.
पीएम मोदी ने कहा कि वाघू तेजी से लोकप्रिय हो रही है और देश के अन्य हिस्सों तक पहुंच रही है. मुझे इस प्रयास से जुड़े सभी लोगों पर बहुत गर्व है. आज, हम सभी स्थानीय उत्पादों पर ज़ोर दे रहे हैं; हम ‘वोकल फॉर लोकल’ के मंत्र के साथ आगे बढ़ रहे हैं. इस संदर्भ में, कश्मीर की ‘वाघू’ को भी अपने घर का हिस्सा बनाने पर जरूर विचार करें.
–
डीकेएम/
Skip to content