आतंकवाद से जुड़े मामले में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने सोपोर में 26 ठिकानों पर चलाया तलाशी अभियान

श्रीनगर, 9 अगस्त . जम्मू-कश्मीर Police ने आतंकवाद से जुड़े मामले में Sunday को प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी (जेईआई) के खिलाफ सोपोर में 26 जगहों पर एक साथ तलाशी अभियान चलाया. गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत यह कार्रवाई की गई है.

अधिकारियों ने बताया कि ये तलाशी अभियान सबूत इकट्ठा करने और प्रतिबंधित जेईआई नेटवर्क के लिंक का पता लगाने की जांच का हिस्सा हैं.

जमात-ए-इस्लामी को केंद्रीय गृह मंत्रालय (एमएचए) ने गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत एक गैर-कानूनी संगठन घोषित किया था. अलगाववादी और आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े होने के कारण इस समूह पर प्रतिबंध लगाया गया था. यह कार्रवाई 2019 के पुलवामा हमले के बाद की गई थी. फरवरी 2024 में एमएचए ने इस प्रतिबंध को और पांच साल के लिए बढ़ाया.

अधिकारी इस संगठन पर लगातार प्रतिबंध के कारणों के तौर पर राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा के लिए खतरे व अलगाववाद को बढ़ावा देने का हवाला देते हैं.

जमात-ए-इस्लामी जम्मू-कश्मीर का गठन 1950 के दशक में एक अलग शाखा के रूप में हुआ था, जो सैयद अबुल आला मौदूदी की इस्लामी शिक्षाओं से प्रभावित थी. जमात-ए-इस्लामी ने स्कूलों और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों का एक बड़ा नेटवर्क चलाते हुए कट्टर धार्मिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया.

यह संगठन कश्मीर को एक विवादित क्षेत्र मानता है. जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख नेताओं में मौलाना सादुद्दीन ताराबली शामिल थे, जिन्होंने 1953 में संगठन की स्थापना की थी और 1985 तक संगठन के प्रमुख रहे.

उन्होंने 1990 के दशक में अलगाववादी हिंसा शुरू होने तक जम्मू-कश्मीर में चुनावी प्रक्रिया में भाग लिया. इस समूह के सबसे प्रमुख और विवादास्पद नेता सैयद अली शाह गिलानी थे. अलगाववादी हिंसा शुरू होने से पहले गिलानी ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा के लिए आठ बार चुनाव लड़ा. वे तीन बार जीते और पांच बार हारे.

वे जमात-ए-इस्लामी के एक कट्टरपंथी नेता थे. बाद में वे मुख्यधारा की जमात से अलग हो गए और ‘तहरीक-ए-हुर्रियत’ बनाई. 2021 में अपनी मौत तक, वे दशकों तक Pakistan-समर्थक कड़े रुख पर कायम रहे.

जमात-ए-इस्लामी में टूट के बाद एक गुट बना, जिसका नाम जस्टिस एंड डेवलपमेंट फ्रंट (जेडीएफ, जम्मू-कश्मीर) रखा गया. कई पूर्व कार्यकर्ताओं ने घोषणा की कि वे देश के संवैधानिक ढांचे के भीतर काम करेंगे.

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