
jaipur, 22 मई . jaipur नगर निगम मुख्यालय में Friday को उस समय हड़कंप मच गया, जब अदालत के आदेश पर नगर निगम आयुक्त ओम कसेरा की कुर्सी कुर्क करने के लिए कोर्ट टीम निगम मुख्यालय पहुंच गई.
यह कार्रवाई चंद्रकांत नागर बनाम जेडीए और अन्य के मामले में jaipur महानगर प्रथम न्यायालय के एससीजेएम-1 (वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश-सह-महानगर मजिस्ट्रेट-1) की ओर से जारी आदेशों के बाद शुरू की गई थी.
अदालत के निर्देश पर कार्रवाई करते हुए, कोर्ट बेलीफ बाबूलाल शर्मा, डिक्री धारक रश्मिकांत नागर और अधिवक्ता संजय शर्मा नगर निगम मुख्यालय पहुंचे और आयुक्त कार्यालय के अंदर कानूनी कार्यवाही शुरू कर दी, जिससे अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच दहशत और हलचल मच गई.
यह विवाद 2013 का है, जब Rajasthan उच्च न्यायालय ने नगर निगम को याचिकाकर्ता चंद्रकांत नागर को उसी वर्ष 26 सितंबर को आवंटन पत्र जारी करने का निर्देश दिया था.
याचिकाकर्ता के अनुसार, उच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, निगम ने 13 वर्ष बाद भी आवंटन पत्र जारी नहीं किया. बार-बार निर्देशों का पालन न करने पर मामला निचली अदालत में लाया गया, जिसने मामले को गंभीरता से लिया और 20 मई को आयुक्त की कुर्सी के विरुद्ध कुर्की की कार्यवाही का आदेश दिया.
खबरों के मुताबिक, अदालत ने यह टिप्पणी की कि न्यायिक आदेशों का लगातार पालन न करना अदालत की अवमानना के बराबर है.
नगर निगम मुख्यालय में अदालत के अधिकारियों के आगमन से नगर निगम प्रशासन में हलचल मच गई. न्यायालय के प्रतिनिधियों ने आयुक्त के कक्ष के अंदर प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं को पूरा किया, जबकि अधिकारियों ने साथ ही साथ संभावित अगले कदमों के संबंध में कानूनी सलाहकारों से परामर्श करना शुरू कर दिया.
इस घटना ने प्रशासनिक और कानूनी हलकों में तीखी बहस छेड़ दी है, और यह सवाल उठ रहा है कि उच्च न्यायालय का आदेश एक दशक से अधिक समय तक लागू क्यों नहीं किया गया.
कानूनी विशेषज्ञों ने इस घटनाक्रम को सरकारी विभागों द्वारा अदालती निर्देशों की लंबे समय तक अवहेलना के खिलाफ एक कड़ा संदेश बताया है. यह मामला अब प्रशासनिक और न्यायिक दोनों स्तरों पर बहस का एक प्रमुख विषय बन गया है.
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एबीएम
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