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वेदों में भी है बर्ड वॉचिंग की चिरंतन परंपरा : बृहत्संहिता में मिलता है पक्षीदर्शन का सटीक वर्णन- डॉ.जुगनू


उदयपुर. पक्षीविहारों, अभयारण्यांे में घूमना और पक्षियों के क्रिया-कलापों को देखना किसे अच्छा नहीं लगता ? सैकड़ों लोग हैं जो पक्षीदर्शन में लगे हैं. कई क्लब और संस्थाएं भी इस दिशा में सक्रिय है. इन दिनों जबकि समंदर पार के परिंदे हमारे देश में आए हुए हैं, उनको देखने, दिखाने और फोटो खींचने की होड़ सी लगी हुई है. यह विचार पर्यावरणविद् एवं पक्षी प्रेमी डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू ने बर्ड फेस्टिवल में सैंकड़ों की तादाद में आए पक्षीप्रेमियों को हुजूम को देखकर व्यक्त किए.

उन्होंने बताया कि हमारे शास्त्र जाहिर करते हैं कि पक्षी दर्शन की परंपरा नई नहीं है. यह बहुत पुरानी जान पड़ती है. यूं तो अथर्ववेद में शकुन पक्षी के क्रिया कलापों की सर्वप्रथम चर्चा हुई है. आथर्वण परिशिष्ट में भी ऐसा कुछ वर्णन है. अंग विज्जा जैसे कुषाणकालीन ग्रंथ में भी इसी प्रकार का वर्णन मिलता है मगर वराहमिहिर ने पक्षियों की आवाजों को सुनकर फलाफल देखने का मत दिया है. वराह का काल छठीं सदी रहा है और 587 ई. में उनकी महत्वपूर्ण कृति ‘बृहत्संहिता’ पूरी हो गई थी. यह वही कृति है जिसमें भूमि में पाए जाने वाले जीवों के जीवनस्तर, पर्यावरण आदि पर भी विमर्श किया गया है.

यह जानकर आश्चर्य होगा कि वराह ने पक्षीदर्शन का इतना सटीक वर्णन किया है पक्षियों की आवाजों तक को लिखा है. यही नहीं, उन आवाजों को सुनकर शकुन के रूप में उनका फल बताया गया है. यह वर्णन वसंतराज शाकुनम्, शकुनप्रदीप, शकुनावली, शकुन संग्रह जैसे लगभग सौ ग्रंथों की रचना का आधार बना है. स्वयं वराह ने अपनी बृहत् यात्रा, योगयात्रा और लघुयात्रा में इनका वर्णन किया है, ये सारे ही ग्रंथ भारत की अप्रतिम निधि माने जाते हैं.

जुगनू ने कहा कि उन पक्षियों के बारे में जानिये जिनकी चेष्टाओं, स्वरों, गति आदि का बहुत रोचक ढंग से बृहत्संहिता में अध्ययन प्रस्तुत किया गया है – श्यामा (पोतकी, काली चिडि़या), बाज, शशघ्न, वंजुल, मयूर, श्रीकर्ण, चकवा, चाष, अंडीरक, खंजन, तोता, कौआ, तीन प्रकार के कपोत, भारद्वाज, गर्ताकुक्कुट, हरियल, गिद्ध, फेंट पक्षी, मुर्गा, करायिक, चटका आदि. वराह ने दिनचारी, रात्रिचारी, खेचर, भूचर आदि के आधार पर उनका वर्गीकरण भी किया है.

देखिये कि वंजुल जैसा पक्षी कैसी आवाज करता है, वराह कहते हैं कि उसका प्रशस्त शबद तित्तिड़ और पूर्ण शब्द किल्किली है. श्यामा पक्षी का चिचित शब्द पूर्ण, शूलिशूल शब्द शुभ है, चच्च शब्द दीप्त और चिक्चिक् शब्द संयोग को प्रकट करने वाला है. हारीत या हरियल का गुग्गु शब्द पूर्ण और अन्य शब्द दीप्त होते हैं. करायिका पक्षी का किषकिषि, कोटुक्लि, कटुक्लि, कोटिकिलि औ गुं जैसे शब्दों के अलग अलग फल होते हैं….

ऐसे कई वर्णन है, है न रोचक अध्ययन. यह ज्ञान और उससे होने वाले फलों की जानकारी पक्षीविदों के पास है कि नहीं, मालूम नहीं, वराहमिहिर के पास जरूर थी जिसके अध्ययन के बाद हजारों पन्ने उसके वर्णन के आधार पर टीका और रचना के रूप में रंगे गए हैं.

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