Supreme Court में शिवसेना नाम-निशान विवाद पर सुनवाई, कपिल सिब्बल ने ईसीआई के अधिकार क्षेत्र पर उठाए सवाल

New Delhi, 12 अगस्त . उद्धव ठाकरे गुट बनाम एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना मामले में पार्टी के नाम और चुनाव निशान ‘तीर-कमान’ पर अधिकार को लेकर चल रही लड़ाई पर Wednesday को Supreme Court में सुनवाई हुई. उद्धव ठाकरे की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलीलें रखीं. अदालत ने कहा कि सुनवाई Thursday को भी जारी रहेगी.

सिब्बल ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए का जिक्र करते हुए कहा कि इस कानून की उप-धारा 9 के तहत अगर पार्टी के नाम, मुख्य कार्यालय, पदाधिकारियों या पते में कोई बदलाव होता है तो उसकी सूचना निर्वाचन आयोग को देना अनिवार्य है. हमने निर्वाचन आयोग को सूचित किया था. उस पर भी बेवजह विवाद किया गया. हमने तो अपना कर्तव्य निभाते हुए पदाधिकारियों के नाम दिए थे. वे जानते हैं कि बदलाव हुआ है, इसलिए वे कहते हैं कि हमें बताइए. वे कहते हैं कि वे 2018 के संविधान के बारे में नहीं जानते. लेकिन, संचार में ‘शिवसेना पक्ष प्रमुख’ का स्पष्ट उल्लेख था.

इस पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि जब तक कोई बदलाव न हो, तब तक सूचित करने की आवश्यकता नहीं है.

सिब्बल ने जवाब दिया कि हमने कानून के तहत जो भी जरूरी था, वह किया. ईसीआई के लिए यह कहना सुविधाजनक है कि उनके पास नवीनतम संविधान नहीं है. ईसीआई का कहना है कि सभी उप-नेता मनोनीत हैं, लेकिन वे निर्वाचित हैं. ईसीआई दस्तावेजों को देखता तक नहीं है.

उन्होंने आरोप लगाया कि पक्ष प्रमुख के पद पर भी बागी गुट ने अपनी मर्जी से बदलाव किया. सिब्बल ने अनुसूची ‘ए’ का हवाला देते हुए कहा कि इसमें साफ है कि पक्ष प्रमुख चुनाव से ही नियुक्त होगा. पार्टी पूरी तरह लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बंधी है. शिंदे को सदन में शिवसेना नेता बनाया गया था.

सिब्बल ने बताया कि 2018 में पार्टी की सामान्य सभा में 12 उप-नेता मनोनीत किए गए थे और 21 को निर्वाचित किया गया था. 4 अप्रैल की तारीख वाला दस्तावेज है और उस पर निर्वाचन आयोग की मुहर भी लगी है. 2018 में सबके सामने हुई कार्यवाही में दस्तावेज में धोखाधड़ी नहीं की जा सकती थी.

जस्टिस बागची ने पूछा कि फरवरी में नेताओं की संख्या बदल गई थी. क्या आप निर्वाचित सदस्यों के नामों की जानकारी नहीं देते हैं? सिब्बल ने कहा कि हम देते हैं. हमने मनोनीत और निर्वाचित दोनों की जानकारी दी थी. हमारी दलील यह है कि हमने पार्टी का संविधान भी दिया था.

जस्टिस बागची ने कहा कि शिंदे गुट का कहना है कि यह दस्तावेज बाद में तैयार किया गया था. इस पर सिब्बल ने कहा, “इस पर ईसीआई की मुहर लगी हुई है. अगर यह बाद में तैयार किया गया था, तो उन्हें कार्रवाई करनी चाहिए थी.”

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा, “पार्टी में विभाजन का फैसला 10वीं अनुसूची के तहत ही किया जाना है. आपको इस बात पर बहस करनी होगी कि क्या बाद में घटी घटनाओं पर विचार किया जा सकता है या नहीं. संविधान पीठ ने यह नहीं कहा था कि विधायक दल का विभाजन, संगठन में लागू नहीं हो सकता. यदि आप कहते हैं कि शुरुआत में ही ईसीआई का क्षेत्राधिकार नहीं बनता, तो फिर किसी भी चीज में नहीं जाया जा सकता. लेकिन, अगर क्षेत्राधिकार है और उसका गलत इस्तेमाल हुआ है, तो यह अलग मुद्दा है.”

सिब्बल ने कहा, “अगर पार्टी में विभाजन का प्रथम दृष्टया मामला बनता है तो स्थिति आगे स्पष्ट होगी. लेकिन, 19 जुलाई को आयोग के पास कौन सा दस्तावेज उपलब्ध था? आयोग ने किस आधार पर निर्णय किया? उस दिन आयोग के पास सिर्फ दो दस्तावेज थे. एक लेजिस्लेटिव स्ट्रेंथ से जुड़ा था और दूसरा एक मीटिंग से.”

उन्होंने आगे कहा, “एक बार जब आप चीफ मिनिस्टर बन जाते हैं तो क्या होता है? जाहिर है, लोग आपके पास आएंगे. उस जमीनी हकीकत को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. हमारे हिसाब से, उन्हें गैरकानूनी तरीके से चीफ मिनिस्टर बनाया गया था. आप पहले उन्हें चीफ मिनिस्टर नहीं बना सकते और फिर कह सकते हैं कि बाद में इतने सारे लोग उनके साथ जुड़ गए.”

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “अगर इन सभी बातों पर ध्यान दिया जाए तो यह कहना सही नहीं है कि इलेक्शन कमीशन के पास अधिकार क्षेत्र नहीं था. उसका तरीका गलत हो सकता है. अगर कमीशन के पास अधिकार क्षेत्र नहीं है तो आगे कुछ भी जांचा नहीं जा सकता. अगर अधिकार क्षेत्र था और उसका गलत इस्तेमाल हुआ तो यह अलग मुद्दा है. हालांकि, आपकी दलील यह है कि कमीशन के पास कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था.”

सिब्बल ने कहा, “निर्वाचन आयोग ने कहा कि हमें अनुशासन समिति के पास जाना चाहिए था. मैं शिंदे को किस चीज से निष्कासित करता? उन्होंने तो मुझे यानी पक्ष प्रमुख उद्धव ठाकरे को ही निष्कासित कर दिया. जबकि शिवसेना पक्ष प्रमुख का चुनाव होता है. पार्टी की सर्वोच्च इकाई राष्ट्रीय कार्यकारिणी है. जिला प्रमुख, उप-जिला प्रमुख मनोनीत होते हैं और वे निर्वाचित व्यक्तियों के निर्णय लागू करते हैं.”

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ‘शिवसेना नेता’ अभिव्यक्ति थोड़ी अस्पष्ट है. क्या इसका मतलब विधायी पार्टी के नेता से है या संगठन के नेता से? सिब्बल ने कहा कि इसका मतलब संगठन में नेता से है. ईसीआई एक विशेष निष्कर्ष पर पहुंचना चाहता था, इसलिए उसने 2018 के संविधान को नजरअंदाज कर दिया. उन्होंने पहले ही नतीजा तय कर लिया था.

सिब्बल ने यह भी कहा, “आयोग 13 वर्षों तक यह पता ही नहीं लगा पाया कि पार्टी का दूसरा संविधान भी है. आयोग तो सभी Political दलों के गठन पर निगाह रखता है. फिर वे तर्क देते हैं कि यह संविधान रिकॉर्ड पर ही नहीं है. आयोग ने Samajwadi Party वाले फैसले का हवाला दिया.”

इस पर सीजेआई ने पूछा, “कौन जीता, पिता या बेटा?” सिब्बल ने हंसते हुए कहा, “बेटे की जीत हुई. मैंने बेटे की पैरवी की थी.”

एससीएच/एबीएम