
New Delhi, 14 जुलाई . पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) एस.वाई. कुरैशी ने Tuesday को कहा कि उन्होंने एक समय Prime Minister कार्यालय (पीएमओ) में संयुक्त सचिव के पद पर नियुक्ति का प्रस्ताव ठुकरा दिया था. उनका कहना था कि वह अपनी पहचान एक सक्षम आईएएस अधिकारी के रूप में चाहते थे, न कि केवल एक मुस्लिम अधिकारी के रूप में. उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें आशंका थी कि कुछ संवेदनशील मंत्रालयों में मुस्लिम अधिकारी होने के कारण उनके साथ अतिरिक्त जांच-पड़ताल की जा सकती है.
को दिए एक विशेष साक्षात्कार में कुरैशी ने कहा कि वह अपनी पेशेवर योग्यता के आधार पर पहचाने जाना चाहते थे. उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम का उल्लेख अपनी नई पुस्तक ‘इंडिया एंड आई: ए हंड्रेड मेमोरीज, नॉट ए मेमॉयर’ में भी किया है.
उन्होंने बताया कि उस समय वह युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय में संयुक्त सचिव थे. इसके अलावा नेहरू युवा केंद्र संगठन (एनवाईकेएस) के महानिदेशक और राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के प्रमुख भी थे.
कुरैशी ने कहा, “मैं युवा कार्यक्रम मंत्रालय में संयुक्त सचिव था. साथ ही नेहरू युवा केंद्र संगठन का महानिदेशक भी था, जिसके देशभर में तीन लाख युवा क्लब थे. मैं राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) का प्रमुख भी था, जो 300 विश्वविद्यालयों में संचालित होती थी.”
उन्होंने कहा कि इस जिम्मेदारी के कारण उनका काम केवल सचिवालय तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे देश में फील्ड स्तर पर काम करने का अवसर मिलता था.
उन्होंने कहा, “मेरे पास सचिवालय और फील्ड, दोनों तरह की जिम्मेदारियां थीं. यह अपने आप में अनोखी नौकरी थी और मैं इसका पूरा आनंद ले रहा था. इसलिए मैं पीएमओ नहीं जाना चाहता था, जहां व्यक्ति गुमनाम होकर पर्दे के पीछे काम करता है. हालांकि पीएमओ में काम करना अपने आप में सम्मान की बात है.”
कुरैशी ने बताया कि उन्हें पीएमओ में नियुक्ति की जानकारी आधिकारिक रूप से नहीं, बल्कि किसी अन्य व्यक्ति से मिली. उन्होंने कहा कि उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उनकी सुरक्षा मंजूरी (सिक्योरिटी क्लियरेंस) भी हो चुकी थी और नियुक्ति आदेश जारी होने वाला था.
उन्होंने कहा, “जब किसी ने मुझे बताया कि मेरी पीएमओ में नियुक्ति होने जा रही है, तो वह सोच रहा था कि मैं खुश हो जाऊंगा, लेकिन मैं हैरान रह गया. मैंने कहा कि मुझे तो किसी ने बताया ही नहीं. उसने कहा कि सारे फैसले हो चुके हैं, सुरक्षा मंजूरी भी मिल गई है और आदेश कभी भी आ सकता है.”
पूर्व सीईसी ने कहा कि उनकी एक और व्यक्तिगत सोच थी कि वह Prime Minister कार्यालय, गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय जैसे विभागों में काम नहीं करना चाहते थे.
उन्होंने कहा, “मेरे मन में शायद सही या गलत, एक धारणा थी कि इन मंत्रालयों में मुस्लिम अधिकारी होने के कारण मेरे ऊपर अतिरिक्त नजर रखी जा सकती है. ‘यह मुस्लिम अधिकारी है, इसलिए इस पर विशेष निगरानी रखो’ जैसी स्थिति मुझे बिल्कुल स्वीकार नहीं थी. यह मेरे लिए अपमानजनक होता. मैं पंचायत राज विभाग में राजा बनना पसंद करता, लेकिन इन तीन मंत्रालयों में संदेह की नजर से देखा जाना स्वीकार नहीं था. यह मेरी लंबे समय से बनी सोच थी.”
कुरैशी ने बताया कि उन्होंने उस समय पीएमओ में अतिरिक्त सचिव एन.के. सिन्हा से भी साफ कहा था कि वह किसी तरह के धार्मिक आधार या ‘कोटे’ के तहत नियुक्त नहीं होना चाहते.
उन्होंने कहा, “मैंने उनसे कहा कि मैं मुस्लिम अधिकारी के रूप में पीएमओ नहीं आना चाहता. मैं एक प्रतिभाशाली और सक्षम अधिकारी के रूप में वहां आना चाहता हूं. उन्होंने कहा कि कुछ मामलों, जैसे वक्फ से जुड़े विषयों पर सलाह के लिए मुस्लिम अधिकारी की जरूरत होती है. इस पर मैंने कहा कि उसके लिए किसी निदेशक स्तर के अधिकारी को रखा जा सकता है या मैं कुछ अन्य नाम सुझा सकता हूं, लेकिन मेरी यही सोच है.”
कुरैशी ने आगे बताया कि बाद में तत्कालीन Prime Minister के सचिव के.आर. वेणुगोपाल ने भी उनकी इस सोच का समर्थन किया. उनके अनुसार, वेणुगोपाल ने उनसे कहा था कि उन्होंने छह महीने पहले ही पीएमओ के लिए उनका नाम सुझाया था, लेकिन उन्हें यह कहकर मना कर दिया गया कि वहां पहले से एक मुस्लिम अधिकारी कार्यरत है और दूसरा नहीं रखा जा सकता.
कुरैशी ने कहा, “वेणुगोपाल ने मुझसे कहा कि तुम्हारा रुख बिल्कुल सही था. मैंने छह महीने पहले तुम्हारा नाम सुझाया था, लेकिन मुझे बताया गया कि वहां पहले से एक मुस्लिम अधिकारी है, इसलिए दूसरा नहीं रखा जा सकता. इसके बाद मैंने कुछ वैकल्पिक नाम सुझाए, लेकिन वे स्वीकार नहीं किए गए और उस पद पर कार्यरत अधिकारी का कार्यकाल दो वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया.”
–
डीएससी
Skip to content