रांची में स्वामी जगन्नाथ की 335वीं ऐतिहासिक रथयात्रा में उमड़ा आस्था का सैलाब

रांची, 16 जुलाई . रांची में Thursday को भगवान जगन्नाथ की 335वीं ऐतिहासिक रथयात्रा श्रद्धा, परंपरा और सामाजिक समरसता के वातावरण में निकाली गई. जगन्नाथपुर मंदिर से निकली इस यात्रा में लाखों श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया. जय जगन्नाथ के उद्घोष, शंखनाद और भक्ति गीतों के बीच भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के विग्रहों को भव्य रथ पर विराजमान कर मौसीबाड़ी के लिए रवाना किया गया. पारंपरिक पूजा-अर्चना और विशेष अनुष्ठानों के बाद भगवान के विग्रहों को रथ पर स्थापित किया गया.

रथयात्रा शुरू होते ही श्रद्धालुओं का उत्साह चरम पर पहुंच गया. हजारों श्रद्धालुओं ने रथ की रस्सियां थामकर उसे करीब आधा किलोमीटर दूर स्थित मौसीबाड़ी तक खींचा. भगवान जगन्नाथ नौ दिनों तक मौसीबाड़ी में भक्तों को दर्शन देंगे. इसके बाद घुरती रथयात्रा के साथ उनकी मुख्य मंदिर में वापसी होगी. Chief Minister हेमंत सोरेन भी रथयात्रा में शामिल हुए. इस अवसर पर उन्होंने अपने संदेश में कहा कि महाप्रभु श्री जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और माता सुभद्रा की कृपा सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य का संचार करे.

उन्होंने कहा कि रथयात्रा सेवा, समरसता, आस्था और मानवता के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है. रांची की रथयात्रा देश की सबसे पुरानी रथयात्राओं में गिनी जाती है. इसकी शुरुआत वर्ष 1691 में नागवंशी शासक ऐनीनाथ शाहदेव ने की थी. पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर से प्रेरित होकर उन्होंने जगन्नाथपुर पहाड़ी पर मंदिर का निर्माण कराया और उसी परंपरा के अनुरूप यहां रथयात्रा की शुरुआत की. आज यह आयोजन Jharkhand की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है.

जगन्नाथपुर मंदिर की वास्तुकला और पूजा-पद्धति पुरी के जगन्नाथ मंदिर से काफी हद तक मेल खाती है. यहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काष्ठ निर्मित प्रतिमाओं की पारंपरिक विधि से पूजा की जाती है. रथयात्रा के दौरान रथ खींचने को श्रद्धालु विशेष पुण्य का कार्य मानते हैं. इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सामाजिक समरसता है.

वर्षों से विभिन्न जातियों और समुदायों के लोग मंदिर और रथयात्रा की व्यवस्थाओं में अपनी पारंपरिक जिम्मेदारियां निभाते आ रहे हैं. यही परंपरा रांची की रथयात्रा को केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सौहार्द का भी प्रतीक बनाती है. रथयात्रा के साथ शुरू हुए नौ दिवसीय मेले में Jharkhand सहित पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है.

एसएनसी/पीएम