इको-फ्रेंडली प्लास्टिक पैकेजिंग से बढ़ेगी खाने की शेल्फ लाइफ, घटेगा प्रदूषण

New Delhi, 22 जुलाई . आज के समय में खाने-पीने की चीजों को लंबे समय तक ताजा और सुरक्षित रखने में फूड पैकेजिंग की बहुत बड़ी भूमिका है. दूध, फल, सब्जियां, स्नैक्स या तैयार भोजन हर चीज को ऐसी पैकेजिंग की जरूरत होती है जो हवा और नमी से बचाकर उसकी गुणवत्ता बनाए रखे. लेकिन इसके लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक पर्यावरण के लिए बड़ी समस्या बन चुका है. यह वर्षों तक मिट्टी और पानी में पड़ा रहता है और आसानी से नष्ट नहीं होता. यही वजह है कि दुनिया भर के वैज्ञानिक ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं जो भोजन को सुरक्षित रखने के साथ-साथ पर्यावरण को भी नुकसान न पहुंचाएं.

इसी दिशा में इंडोनेशिया के हसनुद्दीन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एंडी दिरपान और उनकी टीम ने एक नई तरह की बायोडिग्रेडेबल फूड पैकेजिंग फिल्म तैयार की है. यह फिल्म पौधों से बनने वाले प्लास्टिक पॉलीलैक्टिक एसिड (पीएलए) पर आधारित है. खास बात यह है कि इसमें मजबूती बढ़ाने के लिए माइक्रोक्रिस्टलाइन सेल्यूलोज (एमसीसी) और ऑक्सीजन को नियंत्रित करने के लिए ब्यूटाइलेटेड हाइड्रॉक्सीटोल्यून (बीएचटी) का इस्तेमाल किया गया है. इस शोध को 5 मई 2026 को ऑनलाइन प्रकाशित किया गया और मार्च 2027 में आसियान जर्नल फॉर साइंस एंड इंजीनियरिंग इन मैटेरियल्स के वॉल्यूम 6 में प्रकाशित किया जाएगा.

सामान्य तौर पर पीएलए को पर्यावरण-अनुकूल प्लास्टिक माना जाता है क्योंकि यह प्राकृतिक स्रोतों से बनता है और समय के साथ नष्ट भी हो जाता है. लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि यह सामान्य प्लास्टिक जितना मजबूत नहीं होता और ऑक्सीजन को भी उतनी अच्छी तरह नहीं रोक पाता. ऑक्सीजन के संपर्क में आने से खाने की चीजें जल्दी खराब होने लगती हैं. इसलिए वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसा तरीका खोज रहे थे जिससे पीएलए की मजबूती भी बढ़े और वह ऑक्सीजन को भी बेहतर तरीके से नियंत्रित कर सके.

इस शोध का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इसमें प्रयुक्त सेल्यूलोज को लकड़ी या पारंपरिक फसलों के बजाय, फर्मेंटेड (किण्वित) नारियल पानी से तैयार किया गया है. यह वही प्रक्रिया है, जिसके ज़रिए ‘नाटा डी कोको’ नामक जेलीनुमा खाद्य पदार्थ बनाया जाता है. इस प्रक्रिया के दौरान बैक्टीरिया पूरी तरह शुद्ध और रेशेदार सेल्यूलोज का निर्माण करते हैं. वैज्ञानिकों ने इस सेल्यूलोज को परिष्कृत (साफ) करके ‘माइक्रोक्रिस्टलाइन सेल्यूलोज’ (एमसीसी) पाउडर में बदला और फिर इसे पीएलए फिल्म में मिलाया. इस फिल्म को तीन बारीक परतों में तैयार किया गया, जबकि बीएचटी को केवल भीतर की दो परतों में रखा गया ताकि वह सीधे भोजन के संपर्क में रहकर ऑक्सीजन के प्रभाव को नियंत्रित कर सके.

शोधकर्ताओं ने एमसीसी की अलग-अलग मात्रा मिलाकर कई प्रकार की फिल्मों का परीक्षण किया. इस दौरान उन्होंने नारियल पानी से निर्मित एमसीसी की तुलना बाजार में उपलब्ध सामान्य एमसीसी से भी की. परिणामों से स्पष्ट हुआ कि जैसे-जैसे एमसीसी की मात्रा बढ़ाई गई, फिल्म की मजबूती में वृद्धि होती गई और उससे ऑक्सीजन का रिसाव (पारगम्यता) भी कम होता गया.

माइक्रोस्कोपिक जांच में सामने आया कि नारियल पानी से बने एमसीसी वाली फिल्म की संरचना अत्यधिक सुगठित, समान और त्रुटिहीन थी. वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि बैक्टीरिया द्वारा तैयार सेल्यूलोज कहीं अधिक शुद्ध और उच्च रेशेदार गुणवत्ता वाला था. यही कारण है कि इसने बाजार में मिलने वाले सामान्य एमसीसी की तुलना में बेहतर परिणाम दिए.

पर्यावरण के लिहाज से भी इस नई पैकेजिंग ने अच्छे परिणाम दिए. जब इस फिल्म को मिट्टी में दबाकर परीक्षण किया गया तो 25 दिनों में इसका लगभग 28.86 प्रतिशत हिस्सा प्राकृतिक रूप से टूट गया. वैज्ञानिकों के अनुसार यह दर अन्य बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक के बराबर या उससे बेहतर है.

हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी माना कि अभी इस तकनीक पर और काम करने की जरूरत है. फिल्म मजबूत और ऑक्सीजन रोकने में प्रभावी जरूर बनी, लेकिन वह ज्यादा लचीली नहीं थी. पैकेजिंग सामग्री को केवल भोजन की सुरक्षा ही नहीं करनी होती, बल्कि फैक्टरी में पैकिंग, परिवहन और रोजमर्रा के इस्तेमाल के दौरान टूटने से भी बचना होता है. इसलिए भविष्य में वैज्ञानिकों का लक्ष्य ऐसी फिल्म तैयार करना होगा जो मजबूती और लचीलेपन दोनों का सही संतुलन बनाए रखे.

पीआईएम/एएस