
New Delhi/रांची, 23 जून . Jharkhand आंदोलन के प्रणेता और जल-जंगल-जमीन से जुड़े मुद्दों पर आजीवन सघर्ष करने वाले Jharkhand मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक एवं पूर्व Chief Minister शिबू सोरेन को Tuesday की शाम को President भवन में आयोजित समारोह में मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. उनकी पत्नी रूपी सोरेन ने President द्रौपदी मुर्मु के हाथों यह सम्मान ग्रहण किया.
व्हीलचेयर पर समारोह में पहुंचीं रूपी सोरेन के सम्मान में President स्वयं मंच से उतरकर उनके पास गईं और पद्म भूषण प्रदान किया. इस भावुक क्षण ने समारोह में मौजूद लोगों को भी भावुक कर दिया. शिबू सोरेन का नाम Jharkhand के Political और सामाजिक इतिहास में एक ऐसे नायक के रूप में दर्ज है, जिन्होंने आदिवासी अस्मिता, जल-जंगल-जमीन के अधिकार और पृथक Jharkhand राज्य की मांग को जनआंदोलन का स्वरूप दिया. इसी कारण उन्हें सम्मानपूर्वक ‘दिशोम गुरु’ और ‘गुरुजी’ के नाम से जाना जाता है.
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को तत्कालीन बिहार के रामगढ़ (अब Jharkhand) जिले के नेमरा गांव में हुआ था. उनके पिता सोबरन सोरेन महाजनी शोषण के खिलाफ आवाज उठाते थे. इसी संघर्ष के दौरान उनकी हत्या कर दी गई. पिता की मौत ने युवा शिबू सोरेन के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा, और यहीं से उनके जीवन का रास्ता तय हो गया. 70 के दशक में उन्होंने संथाल परगना और उत्तरी छोटानागपुर क्षेत्र में महाजनी प्रथा, भूमि हड़पने और आदिवासियों के शोषण के खिलाफ आंदोलन शुरू किया.
‘धानकटनी आंदोलन’ के जरिए उन्होंने आदिवासी किसानों को उनकी जमीन वापस दिलाने की मुहिम चलाई. इसी दौरान टुंडी क्षेत्र में उन्होंने रात्रि पाठशालाओं का संचालन किया, जहां लोगों को शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और आत्मनिर्भरता का संदेश दिया जाता था. यहीं से लोग उन्हें ‘गुरुजी’ कहने लगे. वर्ष 1972 में Jharkhand मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के गठन के साथ उन्होंने पृथक Jharkhand राज्य की लड़ाई को संगठित Political दिशा दी. अगले लगभग तीन दशकों तक वे इस आंदोलन का सबसे प्रमुख चेहरा बने रहे.
अंततः 15 नवंबर 2000 को Jharkhand अलग राज्य बना, जिसे उनके लंबे संघर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है. शिबू सोरेन तीन बार Jharkhand के Chief Minister बने. वह कई बार दुमका Lok Sabha क्षेत्र से सांसद चुने गए और केंद्र Government में कोयला मंत्री भी रहे. हालांकि, उनकी सबसे बड़ी पहचान सत्ता नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की आवाज के रूप में रही. उनकी Political शैली भी अलग थी. बड़े-बड़े भाषणों की बजाय वे सीधे लोगों से संवाद करने में विश्वास रखते थे. गांवों की बैठकों, जनसभाओं और आंदोलनों के जरिए उन्होंने एक ऐसा जनाधार तैयार किया, जो कई दशकों तक कायम रहा.
–
एसएनसी/डीकेपी
Skip to content