
तिरुवनंतपुरम, 22 अप्रैल . केरल के त्रिशूर जिले के मुंडथिक्कोड में हालिया पटाखा विस्फोट कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि राज्य में आतिशबाजी से जुड़े हादसों के लंबे और चिंताजनक सिलसिले का हिस्सा है. यह सवाल फिर खड़ा हो गया है कि क्या केरल ने अपने पिछले हादसों से वास्तव में कोई सबक लिया है.
इस संदर्भ में सबसे भयावह घटना 2016 में कोल्लम के पुट्टिंगल मंदिर में हुई आतिशबाजी त्रासदी है, जहां प्रतिस्पर्धी आतिशबाजी प्रदर्शन के दौरान हुए भीषण विस्फोट में 111 लोगों की मौत हो गई थी और 350 से अधिक लोग घायल हुए थे. जांच में सामने आया था कि विस्फोटकों का अवैध भंडारण, अनुमति की कमी और सुरक्षा नियमों का उल्लंघन इस हादसे के प्रमुख कारण थे.
हालांकि, लगभग एक दशक बाद भी हालात में खास सुधार नजर नहीं आता. इतिहास बताता है कि ऐसे हादसे न तो नए हैं और न ही दुर्लभ. वर्ष 1952 में सबरीमाला मंदिर में हुए विस्फोट में 68 लोगों की जान गई थी, जो यह दर्शाता है कि त्योहारों में जोखिम लंबे समय से मौजूद रहा है.
इसके बाद, 1987 में त्रिशूर के कुट्टामूली मंदिर में हादसे में 20 लोगों की मौत हुई, जबकि 1990 में मलनाडा मंदिर में हुए विस्फोट में 26 लोगों की जान चली गई.
हाल के वर्षों में भी स्थिति ज्यादा नहीं बदली है. वर्ष 2024 में कासरगोड के अंजूटाम्बलम वीरारकावु मंदिर में आतिशबाजी हादसे में 150 से अधिक लोग घायल हो गए थे. उसी साल त्रिपुनिथुरा में मंदिर उत्सव के लिए रखे पटाखों में विस्फोट से दो लोगों की मौत हो गई और 100 से ज्यादा घर क्षतिग्रस्त हो गए थे. यह घटना इस बात को रेखांकित करती है कि खतरा सिर्फ प्रदर्शन के दौरान ही नहीं, बल्कि भंडारण और हैंडलिंग के दौरान भी बना रहता है.
इन घटनाओं का पैटर्न साफ है, हादसे के बाद जांच, मुआवजे की घोषणा और कड़े नियमों के वादे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका पालन कमजोर रहता है. कई समितियों ने लाइसेंसिंग को सख्त करने, सुरक्षित भंडारण दूरी तय करने और विस्फोटक सामग्री की निगरानी बढ़ाने की सिफारिशें की हैं, लेकिन स्थानीय दबाव, प्रशासनिक खामियां और परंपराओं के दबाव के चलते इनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पाता.
मुंडथिक्कोड की ताजा त्रासदी इसी व्यापक सिस्टम फेलियर का हिस्सा बन गई है. यह संकेत देती है कि अब समस्या केवल अलग-अलग लापरवाही की नहीं, बल्कि उच्च जोखिम वाले त्योहारों में सुरक्षा नियमों को लागू करने में संरचनात्मक विफलता की है.
आज केरल एक अहम मोड़ पर खड़ा है. उसे तय करना है कि वह हर बार हादसे के बाद प्रतिक्रिया देने वाला रुख अपनाए रखेगा या फिर जवाबदेही और सख्त अमल पर आधारित एक निवारक व्यवस्था की ओर बढ़ेगा. अगर यह बदलाव नहीं हुआ, तो हर त्योहार के साथ पुराने जख्म फिर हरे होने का खतरा बना रहेगा.
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डीएससी
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