कोरोना के इलाज में उम्मीद की किरण बनी Convulsant Plasma Therapy, कई मरीज हुए ठीक · Indias News

कोरोना के इलाज में उम्मीद की किरण बनी Convulsant Plasma Therapy, कई मरीज हुए ठीक


नई दिल्ली (New Delhi) . जानलेवा कोरोना के इलाज में उम्मीद की एक नई किरण दिखी है.कोरोना से ठीक हो चुके मरीज के ब्लड प्लाज्मा से नए मरीजों के इलाज में मदद मिली है. चीन में कोरोना के गंभीर मरीजों को यह प्लाज्मा देने के 72 घंटे में ही उनके लक्षण खत्म होने लगे और हालत में सुधार भी हुआ. ब्रिटेन और अमेरिका में भी ठीक हो चुके कोरोना मरीजों के खून से इलाज के अच्छे परिणाम सामने आए हैं.

कोविड-19 (Kovid-19) से उबरे मरीजों के प्लाज्मा में वह एंटीबॉडीज पाया जाता है, जो वायरस से लड़ने के लिए उनकी इम्युनिटी के लिए जरूरी होता है. इस कान्वलेसंट प्लाज्मा थैरेपी के रूप में जाना जाता है. इस थैरेपी का इस्तेमाल पहली बार एक शताब्दी पहले 1918 में स्पैनिश फ्लू महामारी (Epidemic) के समय हुआ था. यह थैरेपी जीवन रक्षक साबित हो रही है और एक छोटे समूह पर किए प्रयोग में कोई गंभीर साइड इफेक्ट भी नहीं देखा गया है.

क्या है प्लाज्मा

प्लाज्मा रक्त की मात्रा का लगभग 55 फीसदी बनाता है और लाल तथा श्वेत रक्त कोशिका के लिए तरल पदार्थ उपलब्ध कराता है, जो उस पूरे शरीर में ले जाता है. इस रोगियों को उचित मात्रा में दिए जाने से एंटीबॉडीज बनता है. लोगों द्वारा यह एंटीबॉडीज सिर्फ संक्रमित हो चुके लोगों से ही बनाया जा सकता है. सार्स और कोरोना (Corona virus)-2 के मामलों में यह देखा जा चुका है कि एंटीबॉडीज किस प्रकार कारगर होते हैं,इसकारण कोविड-19 (Kovid-19) के इलाज में भी इस एक नई उम्मीद के रूप में देखा जा रहा है. हालांकि वैज्ञानिक इस बीमारी के इलाज के लिए और भी तरीकों की खोज कर रहे हैं.

वुहान में हुआ है अध्ययन

कोरोना की शुरुआत गत दिसंबर में चीन के वुहान से हुई थी. वहीं चीन के नेशनल बायोटेक ग्रुप कंपनी लिमिटेड के काई दुआन ने इस संबंध में अध्ययन किया. चूंकि महज एक पायलट अध्ययन था,इसकारण इसके निष्कर्ष प्रारंभिक ही माने गए.इसके तहत तीन अस्पतालों के दस मरीजों को अन्य दवाएं देने के साथ ही कान्वलेसंट प्लाज्मा थैरेपी के लिए चुना गया.

शोधकर्ताओं के मुताबिक, तीन दिनों में ही रोगियों में बुखार, खांसी जैसे लक्षण समाप्त हो गए. रोगियों के लिवर, फेफड़ा तथा ब्लड ऑक्सीजन में सुधार देखा गया, जो इस बात के संकेत थे कि ये वायरस से लड़ रहे हैं. कान्वलेसंट प्लाज्मा चढ़ाने के बाद रोगियों में श्वेत रक्त कोशिका, लिम्फोसाइट्स बढ़ा पाया गया तथा एंटीबॉडी का स्तर भी उच्च बना रहा. दो रोगी, जिन्हें वेंटीलेटर सपोर्ट दिया जा रहा था, उन्हें वेंटीलेटर से हटाया जा सका और उन्हें नाक से ऑक्सीजन दी गई. इन दस रोगियों में से किसी की मौत नहीं हुई.

यह कैसे करता है काम

ब्लड बैंक (Bank) खून की तरह ही प्लाज्मा का भी डोनेशन लेता है. यदि कोई व्यक्ति सिर्फ प्लाज्मा डोनेट करता है,तब उसका खून एक ट्यूब के जरिए निकाला जाता है और उसमें से प्लाज्मा निकाल कर शेष को डोनर के शरीर में वापस पहुंचा दिया जाता है. इसके बाद प्लाज्मा की जांच कर यह सुनिश्चित किया जाता है कि कहीं उसमें कोई रक्त जन्य वायरस तो नहीं है और क्या इसका इस्तेमाल सुरक्षित है. कोविड-19 (Kovid-19) के शोध के लिए इस बीमारी से उबर चुके लोग डोनर हो सकते हैं.

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