नई दिल्ली, 4 अप्रैल . कच्छतीवु द्वीप के मसले पर विश्व हिंदू परिषद ने कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा है कि कांग्रेस ने सिर्फ कच्छतीवु द्वीप ही नहीं, बल्कि अनेक बार भारत की अखंडता को खंड-खंड किया है. विहिप के केंद्रीय संयुक्त महासचिव डॉ सुरेंद्र जैन ने विश्वास जताया कि आगामी चुनाव में भारत की राष्ट्रभक्त जनता ऐसी सरकार का चयन करेगी जो ना सिर्फ़ कच्छतीवु द्वीप बल्कि मां भारती के छीने गए समस्त भू भाग को कब्जाधारियों से मुक्ति दिला कर हमारे राष्ट्रीय संकल्प को पूरा कर सके.

उन्होंने कहा कि कच्छतीवु द्वीप हमेशा से भारत का अभिन्न अंग रहा है. इंदिरा गांधी द्वारा इसे श्रीलंका को सौंप देने का निर्णय मनमाना और असंवैधानिक था. यह भारत की संप्रभुता के साथ किया गया खिलवाड़ तथा संसद व तमिलनाडु विधानसभा एवं वहां के मछुआरों के साथ किया गया एक धोखा था. तत्कालीन कांग्रेसी सरकारों द्वारा भारत की संप्रभुता और अखंडता के प्रति की गई इस गंभीर लापरवाही के लिए विश्व हिंदू परिषद इन सरकारों की घोर निंदा करती है.

डॉ जैन ने कहा कि 26 जून, 1974 को इंदिरा गांधी की सरकार ने इस द्वीप को प्लेट में इस प्रकार सजा कर श्रीलंका को दे दिया था मानो वह उनकी व्यक्तिगत संपत्ति हो. 1956 से लेकर 1974 तक भारत की संसद में लंका की घुसपैठ और भारतीय मछुआरों की त्रासदी के बारे में कई बार प्रश्न किया गया लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्रियों ने इस तरह के गोल-गोल जवाब दिए जैसे उन्हें भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय अखंडता की कोई चिंता ही ना हो. तमिलनाडु की विधानसभा ने तो इसे वापस लेने के लिए कई प्रस्ताव भी पास किए, किन्तु कांग्रेसी सरकारों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी.

विहिप नेता ने आगे कहा कि यह मनमाना निर्णय असंवैधानिक भी था क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने बेरुबारी मामले में स्पष्ट कहा था कि भारत को किसी संधि के अंतर्गत अगर कोई हिस्सा किसी अन्य क्षेत्र को देना भी पड़ता है तो संसद से उसकी स्वीकृति अवश्य लेनी चाहिए. इस मामले में संसद को न केवल अंधेरे में रखा गया अपितु गलत बयानी भी की गई. यहां तक कि तमिल समाज की भावनाओं को समझने के लिए तमिलनाडु विधानसभा में भी इस विषय को लाने की आवश्यकता महसूस नहीं की गई. भारत की संप्रभुता और अखंडता के संबंध में कांग्रेस की सरकारें हमेशा संवेदन शून्य रही हैं. भारत की जमीन पर चीन और पाकिस्तान ने आजादी के थोड़े दिन बाद ही कब्जा कर लिया था जिसको छुड़ाने का कोई गंभीर प्रयास इन सरकारों द्वारा नहीं किया गया. चीन के अवैध कब्जे पर तो जवाहरलाल नेहरू ने यहां तक कह दिया था कि “वहां कुछ पैदा नहीं होता इसलिए उसकी चिंता नहीं करनी चाहिए.” राष्ट्रीय हितों के प्रति इसी प्रकार की संवेदन-शून्यता नेहरू ने तब भी दिखाई थी जब चीन ने तिब्बत पर अवैध कब्जा किया था.

विश्व हिंदू परिषद ने कांग्रेस नेतृत्व से सवाल पूछा कि भारतीय संप्रभुता के प्रति इतनी लापरवाही क्यों बरती गई? कच्छतीवु द्वीप के समर्पण से भारत के कौन से हित पूरे हो रहे हैं? संसद को धोखे में क्यों रखा गया? इस समझौते से पहले या बाद में संसद में क्यों नहीं चर्चा की गई जबकि वैधानिक रूप से संसद की अनुमति चाहिए थी? और तमिलनाडु के मछुआरों के हितों की रक्षा के लिए बार-बार आश्वासन देने के बावजूद उन सरकारों ने क्या किया?

डॉ जैन ने कहा कि विश्व हिंदू परिषद को यह स्पष्ट लगता है कि कांग्रेस सरकारों ने हमेशा अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए राष्ट्रहितों की उपेक्षा की है और विहिप को अब विश्वास है कि आगामी चुनाव में ऐसी सरकार अवश्य आएगी जो न केवल कच्छतीवु द्वीप को वापस लेगी अपितु अपने छीने गए क्षेत्रों को वापस लेने के राष्ट्रीय संकल्प को भी पूरा कर सके.

एसटीपी/