नई दिल्ली, 31 मार्च . भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने तत्कालीन इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा ‘कच्चातिवु द्वीप’ को श्रीलंका को सौंपने के लिए कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा.

उन्होंने रविवार को कहा कि देश के लोकतंत्र की दुहाई देने वाली कांग्रेस ने राष्ट्रहितों के विरुद्ध भारत की जमीन को दूसरे देश को दी, जिसके कारण तमिलनाडु के मछुआरों, जीवनी और देश के गौरवशाली इतिहास के साथ खिलवाड़ किया गया.

दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित इंडी गठबंधन की रैली पर पूनावाला ने कहा कि देश को बचाने की बातें करने वाले अपने परिवार और भ्रष्टाचार को बचाने के लिए इकट्ठे हुए हैं. वो देश में आग लगाने, देश को बांटने और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति संदेह पैदा करते हुए उसे बदनाम करने की साजिश कर रहे हैं. कांग्रेस की नीति हमेशा से देश के साथ गद्दारी और राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता करने तथा देश की अखंडता, एकता और सार्वभौमिकता को तोड़ने की रही है. भारत के टुकड़े-टुकड़े करना कांग्रेस के डीएनए में है.

पूनावाला ने कहा कि जो रामलीला मैदान में देश बचाओ का खोखला नारा दे रहे हैं, उनकी मानसिकता देश बांटने की रही है. 1974 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. करुणानिधि को कच्चातिवु द्वीप को तत्काल प्रभाव से श्रीलंका को सौंप देने का आदेश भेजा था. बिना किसी चर्चा के रात के अंधेरे में इस तरह से देश की अखंडता के खिलाफ इतना बड़ा कदम उठाया गया, जो देश के साथ गद्दारी थी. कच्चातिवु द्वीप देश और तमिलनाडु का अभिन्न अंग था, तमिलनाडु के मछुआरों की जीविका का स्रोत था. उसे केवल ‘परिवार हित’ में एक डील के तहत श्रीलंका को सौंप दिया गया.

एक अखबार में छपे अंश को पढ़ते हुए पूनावाला ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि ‘यह छोटा सा टापू मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता, मेरा वश चले तो इसे श्रीलंका को सौंप दूं. हमारे लिए इस भूमि का क्या महत्व है, ये विषय हर दिन मेरे सामने आता है और मैं तंग होता हूं.’ नेहरू जी ने अक्साई चिन पर चीन के अवैध कब्जे के दौरान ऐसे ही कहा था, ‘इस भूमि पर तो घास का एक टुकड़ा नहीं उगता, चला गया तो क्या फर्क पड़ता है.’ 1960 में जवाहरलाल नेहरू के परिवार के करीबी अटॉर्नी जनरल एमसी सीतलवाड़ ने कहा था कि ये टापू हमारा है, इसे श्रीलंका को नहीं सौंपना है. उन्होंने इस मामले में ऐतिहासिक साक्ष्य भी पेश किए थे. विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव के. कृष्ण राव ने भी इसे भारत की जमीन बताया था.

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने बताया कि 1968 में पूरे विपक्ष ने एक साथ विरोध करते हुए कहा था कि देश की सरकार ऐसा नहीं कर सकती है, लेकिन कांग्रेस की इंदिरा गांधी सरकार ने देश की संसद में झूठ कहा कि सरकार के पास कच्चातिवु द्वीप को श्रीलंका को देने का कोई प्रस्ताव नहीं है. 1969 में भी इस मुद्दे का विरोध किया गया है, तब भी इंदिरा सरकार द्वारा इस पर झूठ बोला गया. लेकिन, 1973-74 में इंदिरा सरकार ने चोरी और चुपके से तत्कालीन मुख्यमंत्री के साथ देश की अखंडता और हितों के खिलाफ समझौता करते हुए देश की जमीन को श्रीलंका को सौंप दिया. भाजपा ने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, सोनिया गांधी और कांग्रेस समेत इंडी गठबंधन से सवाल पूछे – क्या कच्चातिवु द्वीप का श्रीलंका को देना देश के हितों के साथ समझौता था या नहीं.

जीसीबी/एबीएम