जानबूझ कर खड़ा किया गया है कोयला संकट

नई दिल्ली (New Delhi) . भारत में बिजली की गंभीर कमी होने की बात कही जा रही है. विद्युत मंत्री जहां कोयले कमी की को नकार रहे हैं, वहीं प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से पावर प्लांट में कोयले की कमी का निरीक्षण कराए जाने की खबरें हैं.कई पावर प्लांट्स में बिजली उत्पादन के लिए बिल्कुल भी कोयला न होने की खबरें हैं. इसके लिए मॉनसून के दौरान कोयला खनन में आई गिरावट और कोरोना की दूसरी लहर के बाद बढ़ी बिजली की मांग को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. हालांकि सरकार की ओर से अब तक इस मामले पर जो प्रतिक्रिया आई है, वह उलझाने वाली है. विद्युत मंत्री ने कोयले की कमी की होने की बात को पूरी तरह नकार दिया था. वहीं मीडिया (Media) रिपोर्टों के मुताबिक, प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से थर्मल पावर प्लांट में कोयले की कमी का निरीक्षण किया जा रहा है. कोयोले की कमी की खबरों में कितनी सच्चाई है, इसे समझने के लिए डीडब्ल्यू ने ‘कोयला घोटाले’ के नाम से मशहूर कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले के मामले में मुख्य याचिकाकर्ता रहे छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के वकील और एक्टिविस्ट सुदीप श्रीवास्तव से बात की. इस मामले में भारतीय सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) ने सितंबर, 2014 में कोयल ब्लॉक आवंटन को मनमाना और गैरकानूनी ठहराया था.

सुदीप इस मुद्दे पर भी सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) में लड़ाई लड़ रहे हैं कि चूंकि भारत के 15 फीसदी से भी कम हिस्से में घने वन बचे हैं, इसलिए कोयले की मांग को पूरा करने के लिए इसे नहीं छुआ जाना चाहिए. वह दावा करते हैं, “भारत में कोयले की पर्याप्त मौजूदगी है और राज्यों के अंतर्गत आने वाले पावर प्लांट्स में इसकी कमी की अलग-अलग वजहें हैं” वह यह भी कहते हैं, “भारत के किसी भी कोने में पावर प्लांट हो, कोयला पहुंचाने में अधिकतम तीन दिनों का समय लगेगा. बाकी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र (Maharashtra) जैसे राज्यों के पावर प्लांट्स में यह कुछ घंटों में पहुंचाया जा सकता है, ऐसे में यह डर बेवजह बनाया गया है” बिजली कमी में कितनी सच्चाई? सुदीप श्रीवास्तव के मुताबिक, पिछले साल अप्रैल से सितंबर के बीच छह महीनों में कोयले का उत्पादन 28.2 करोड़ टन था. साल भर को पैमाना मानें तो भी 2019-20 के मुकाबले कोयला उत्पादन में खास कमी नहीं है. कोल इंडिया के एक अधिकारी ने भी नाम न छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू को बताया, “राज्य सरकारों के अंतर्गत आने वाले पावर प्लांट और एनटीपीसी जैसी सरकारी कंपनियों को कोयले की सप्लाई फ्यूल सप्लाई अग्रीमेंट के तहत होती है. इसके बाद कोयले की सप्लाई पहले ही कर दी जाती है और भुगतान बाद में लिया जाता है. कई राज्यों ने समय से भुगतान नहीं किया है, जिसके चलते कोल इंडिया ने इनकी सप्लाई रोक दी है” ऐसा करने वाले चार बड़े राज्य उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु (Tamil Nadu) और राजस्थान (Rajasthan) हैं. ‘जान-बूझकर बनाया खतरा’ जानकार मानते हैं कि कोल इंडिया की आपूर्ति रुकने के बाद भी चिंता नहीं होनी चाहिए. सुदीप श्रीवास्तव के मुताबिक, “भारत के पास जल, सौर और पवन ऊर्जा के जरिए करीब 1.4 लाख मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता है. बिजली वितरण कंपनियों से इसका इस्तेमाल करने के लिए क्यों नहीं कहा जा रहा? भारत की कुल बिजली उत्पादन क्षमता में कोयला और लिग्नाइट का हिस्सा 56 फीसदी है.

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