थल सेना दिवस : कैसे भारतीय सेनापति बना भारत का बेटा, और खत्म हुआ सेना पर अंग्रेजी नेतृत्व

New Delhi, 14 जनवरी . अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लंबे संघर्ष के बाद India आजाद तो हो चुका था, लेकिन स्वतंत्रता के बाद भी लगभग डेढ़ साल तक भारतीय सेना की कमान अंग्रेज अफसरों के हाथों में ही रही. यह स्थिति आगे भी बनी रह सकती थी, अगर लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह राजपूत योद्धा ने समय रहते तत्कालीन Prime Minister जवाहरलाल नेहरू को उस कड़वी सच्चाई से अवगत न कराया होता कि किसके पास India और भारतीय सेना का नेतृत्व करने की समझ व अनुभव है और किसके पास नहीं.

आजादी के बाद भी नेहरू के मन में यह विचार था कि भारतीय सेना का नेतृत्व किसी ब्रिटिश अधिकारी को ही सौंपा जाए. ऐसे निर्णायक मोड़ पर लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह राजपूत ने बेबाक अंदाज में सामने आकर भारतीय सैन्य नेतृत्व की क्षमता और आत्मनिर्भरता का पक्ष रखा. 15 जनवरी को मनाए जाने वाले थल सेना दिवस के अवसर पर इसी कहानी को जानने की कोशिश होगी.

इस दिवस को मनाने के पीछे की कहानी शुरू होती है फील्ड मार्शल केएम करिअप्पा से, जो India के पहले कमांडर-इन-चीफ बने.

केएम करिअप्पा ने 1919 में सेना में अस्थायी कमीशन लिया था. काबिलियत ऐसी थी कि अंग्रेज कभी उन्हें दबा नहीं पाए. लेकिन, भारतीय सैनिकों के लिए समान अधिकार का उनका संघर्ष लंबा चला. 1944 का समय आने तक केएम करिअप्पा की रैंक एक ब्रिगेडियर के रूप में थी. उन्होंने कभी आम लोगों की बगावत को ताकत के बलबूते नहीं दबाया, बल्कि दोस्ती से हर स्थिति को संभाला और इसीलिए उनके क्षेत्र में शांति रहती थी.

लेकिन जब आजादी का वक्त आया तो देश बंटवारे के साथ-साथ सेना बंटवारे ने उन्हें गहरी चोट पहुंचाई. समाचार लेखों में जिक्र मिलता है कि केएम करिअप्पा ने बंटवारे के खिलाफ आवाज भी उठाई थी, लेकिन तब तक फैसला हो चुका था. यहां तक कि उनके सामने ही भारतीय सेना के अफसरों, सैनिकों और हथियारों का बंटवारा हुआ था.

आजादी के बाद तकरीबन डेढ़ साल तक भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ का फैसला नहीं हो सका था. तीन वरिष्ठ अफसर थे, जिनमें केएम करिअप्पा के अलावा श्रीनागेश और नाथू सिंह राठौर शामिल थे.

आजादी के बाद जब भारतीय सेना की कमान संभालने की बात आई तो एक ऐसी घटना घटी, जिसने इतिहास बदल दिया. पंडित नेहरू का मानना था कि अभी भारतीय अफसरों के पास अनुभव कम है, इसलिए किसी ब्रिटिश अफसर को सेना का नेतृत्व दे दिया जाए. नेहरू की बात पर पूरी सभा खामोश थी. बंद जुबान में लगभग सभी की हामी थी, लेकिन लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह राजपूत को यह स्वीकार नहीं था.

लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह राठौर ने भरी सभा में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, “सर, हमारे पास देश चलाने का भी कोई अनुभव नहीं है, तो क्या हमें किसी ब्रिटिश को India का पहला Prime Minister चुन लेना चाहिए?” इनकी इस बात से सभा में सन्नाटा छा गया, लेकिन सही मायनों में यह बात सौ टके की थी. समाचार लेखों में विस्तार से इस घटनाक्रम का उल्लेख मिलता है.

इससे आगे की कहानी में जनरल नाथू सिंह राठौर से ही कहा गया कि आप ही सेना प्रमुख क्यों न बन जाएं. उन्होंने मर्यादा और अनुशासन का परिचय दिया और इस पद को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, क्योंकि उनका कहना था कि जो सबसे वरिष्ठ है, वही यह पद संभालेगा. उस समय केएम करियप्पा सबसे वरिष्ठ अफसर थे.

इस तरह फील्ड मार्शल केएम करिअप्पा भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ बने थे और उन्होंने आखिरी ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ जनरल फ्रांसिस रॉय बुचर की जगह ली. यह 15 जनवरी का ही दिन था, जब हमें अपना पहला भारतीय आर्मी चीफ मिला और इसीलिए हर साल 15 जनवरी को भारतीय थल सेना दिवस के रूप में मनाया जाता है.

डीसीएच/एबीएम