एक द्विपीय देश ने बदला अपना नाम, राष्ट्रपति बोले- ये सम्मान से जुड़ी बात

New Delhi, 3 अगस्त . प्रशांत महासागर में स्थित द्विपीय देश नाउरू ने अपना नाम बदल लिया है. विश्व के सबसे छोटे स्वतंत्र गणराज्य को अब रिपब्लिक ऑफ नाओरो नाम से जाना जाएगा. नाम बदलते हुए नाउरू के President डेविड एडियांग ने कहा कि ये राष्ट्रीय भाषा की वर्तनी (स्पेलिंग) और उच्चारण से मेल खाता है.

इसके साथ ही देश के इंटरनेशनल कोड में भी बदलाव हो गया है. ये एनआरयू से बदलकर एनआरओ हो जाएगा और यहां के वासी नाउरुआन के बजाय देई-नाओरो के नाम से जाने जाएंगे. आमतौर पर विदेशों में नाउ-रू का उच्चारण नाउ-एरो किया जाता है.

Government के फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट किए गए एक बयान (29 जुलाई) में कहा गया है कि इस कदम से दक्षिण प्रशांत द्वीप देश को अपना पारंपरिक नाम वापस मिल गया है. इससे पहले एक सरकारी बयान जारी कर बताया गया था कि, देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाउरू के नाम से इसलिए जाना जाने लगा क्योंकि विदेशी इसका उच्चारण नहीं कर पाते थे, कुल मिलाकर ये पसंद का नहीं सुविधा का मामला बन कर रह गया था.

जनवरी में इस कदम का प्रस्ताव संसद में रखा गया. उस समय प्रेसिडेंट डेविड एडियांग ने कहा था, “यह प्रस्तावित बदलाव हमारे देश की विरासत, हमारी भाषा और हमारी पहचान का ज्यादा ईमानदारी से सम्मान करने की कोशिश करता है.” सुझाए गए संवैधानिक संशोधन को जरूरी दो राउंड की वोटिंग में सांसदों ने मंजूरी दे दी है, हालांकि यह तुरंत साफ नहीं था कि दस्तावेजों में औपचारिक संशोधन किया गया था या नहीं.

आधिकारिक साइट पर मिली जानकारी के मुताबिक 12,000 लोगों के साथ, यह आबादी के हिसाब से तुवालु और वेटिकन सिटी के बाद दुनिया का तीसरा सबसे छोटा देश है. 1968 में एक आजाद रिपब्लिक बनने से पहले, इस छोटे से कोरल लाइमस्टोन एटोल (प्रवाल द्वीप) पर जर्मनी का कब्जा था और बाद में ऑस्ट्रेलिया ने इसे चलाया. नाउरू ऐसा देश है जिसकी अपनी कोई राजधानी नहीं है.

इसने मुश्किल हालात का सामना किया है, 1970 के दशक में फॉस्फेट माइनिंग से द्वीप बहुत अमीर हो गया. जिसके बाद इससे पहले कि इंडस्ट्री बंद हो गई, नतीजतन 1990 के दशक में यह आर्थिक बर्बादी के कगार पर पहुंच गया.

अब, यह एटोल क्लाइमेट ब्रेकडाउन के कारण बढ़ते समुद्र के पानी से दुनिया के सबसे ज्यादा खतरे वाले एटोल में से एक है, जिससे Government को एक पेड सिटिजनशिप प्रोग्राम के जरिए विदेशी इन्वेस्टमेंट की तलाश करनी पड़ी.

एडियांग ने कहा कि नाम बदलने से “नए राष्ट्रीय गौरव की शुरुआत” का संकेत मिलता है. जब उनकी Government ने मई में इस कदम के लिए आखिरी बार वोट किया था, तो President ने एक जनमत संग्रह की घोषणा की थी. फिर Government ने जुलाई के आखिरी सप्ताह में अपने बयान में कहा कि “काफी चर्चा” के बाद, सांसदों ने तय किया कि पब्लिक वोट की जरूरत नहीं है.

बयान में कहा गया, “हालांकि रेफरेंडम का मकसद लोगों की मर्जी जानना होता है, लेकिन नाओरो नाम कभी खत्म नहीं हुआ है, बल्कि पूरी तरह से अपनाए जाने का इंतजार कर रहा है. यह नाम पहले से ही लोगों की पहचान है, नेशनल कोट ऑफ आर्म्स पर है, कम्युनिटी में बोला जाता है और सबसे जरूरी बात यह है कि संविधान इसकी इजाजत देता है.”

इस कदम से यह देश अपना नाम बदलकर औपनिवेशिक अतीत से दूर जाने का संकेत देने वाला सबसे नया देश बन गया है. छोटे से अफ्रीकी किंगडम एस्वातिनी ने भी 2018 में अपना नाम बदल लिया. पहले इसका नाम स्वाजीलैंड था. दूसरे देशों ने भी इसे एक तरह के रीब्रांड के तौर पर बदलने की मांग की है, जैसा कि तुर्की ने 2022 में यूएन से कहा था कि वह इसे तुर्किए कहना शुरू करे.

इसके साथ ही अब नाओरो को नेशनल एयरक्राफ्ट का नाम भी बदलना पड़ेगा. Government ने कहा है कि वह पहले से ही दूसरे देशों और इंटरनेशनल संस्थाओं से इस बदलाव को मान्यता दिलाने की कोशिश कर रही थी.

यूएन वेबसाइट पर देश का नया नाम दर्ज है, जिसमें बताया गया है कि Government ने जून में इसे बदलने का अनुरोध किया था. ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के विदेश मंत्रालयों के साथ-साथ इस इलाके में यूएस और चीनी दूतावासों ने भी अपनी वेबसाइटों पर देश का नाम नाओएरो रखा है.

केआर/