
कोलकाता, 27 जुलाई . तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने Monday को Lok Sabha स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने पश्चिम बंगाल चुनाव के परिणाम घोषित होने के तुरंत बाद नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल हुए पार्टी के 20 सांसदों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाओं के शीघ्र निपटारे के लिए हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया.
टीएमसी सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की पूर्व Chief Minister ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने अपने पत्र में तर्क दिया कि 2024 के Lok Sabha चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चुने गए इन 20 सांसदों की अयोग्यता संविधान की 10वीं अनुसूची के प्रावधान और Lok Sabha सदस्यों (दल-बदल के आधार पर अयोग्यता) नियम, 1985 के नियम 6 के तहत मांगी गई है.
उन्होंने पत्र में इस बात पर जोर दिया कि इन 20 सांसदों की अयोग्यता दलबदल के आधार पर मांगी गई थी.
पत्र के अनुसार, “याचिकाओं के साथ एक विस्तृत विवरण भी संलग्न था, जिसमें इन सदस्यों की अयोग्यता के तथ्यात्मक और कानूनी आधार बताए गए थे. ये सदस्य तथाकथित एनसीपीआई से जुड़े हुए हैं, जो एक गैर-मान्यता प्राप्त Political दल है जिसका देश की संसद या किसी भी राज्य विधानसभा में कोई प्रतिनिधित्व या मान्यता प्राप्त दर्जा नहीं है. इस विवरण में यह स्पष्ट किया गया था कि उनका आचरण 10वीं अनुसूची के प्रावधानों के अंतर्गत आता है और Lok Sabha से उनकी तत्काल अयोग्यता का कारण बनता है.”
पत्र में तृणमूल महासचिव ने यह भी बताया था कि अयोग्यता याचिका दायर किए जाने के बाद से पांच सप्ताह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद इस मामले में आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई है और न ही कोई नोटिस जारी किया गया है.
उन्होंने आगे कहा, “इस तरह की निरंतर निष्क्रियता गंभीर चिंता का विषय है. यह सर्वविदित है कि 10वीं अनुसूची के अनुच्छेद 6 के तहत स्पीकर को प्राप्त संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का प्रयोग दलबदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता और उद्देश्य को बनाए रखने के लिए उचित समय के भीतर किया जाना आवश्यक है. अयोग्यता संबंधी कार्यवाही का अनावश्यक रूप से लंबित रहना 10वीं अनुसूची के संवैधानिक उद्देश्य को विफल करता है, उस अनिश्चितता को जारी रहने देता है जिसे संविधान टालना चाहता है, और दलबदल विरोधी कानून में निहित सुरक्षा उपायों को अप्रभावी बनाने का जोखिम पैदा करता है.”
अभिषेक बनर्जी ने आगे तर्क दिया था कि केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री द्वारा इन 20 सांसदों को 19 जुलाई को आयोजित सर्वदलीय बैठक में एक अलग समूह के रूप में आमंत्रित करने के निर्णय से मामले की तात्कालिकता और भी बढ़ गई है.
उन्होंने अपने पत्र में तर्क दिया, “लंबित कार्यवाही के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त किए बिना ऐसे घटनाक्रम याचिकाओं के शीघ्र निपटारे की अनिवार्यता को रेखांकित करते हैं, क्योंकि संबंधित सदस्यों की स्थिति के संबंध में निरंतर अनिश्चितता 10वीं अनुसूची की प्रभावशीलता और संसदीय कार्यवाही की अखंडता दोनों को कमजोर करने की क्षमता रखती है.”
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डीकेपी/
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