
New Delhi, 10 अगस्त . दिल्ली हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न के एक मामले में एक व्यक्ति को दोषी ठहराया है. कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि महिला के कपड़ों का चुनाव उसकी निजी आजादी का मामला है और इसका इस्तेमाल उसके खिलाफ गैर-कानूनी हरकत को सही ठहराने, माफी देने या उस पर सवाल उठाने के लिए नहीं किया जा सकता.
जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने साजिद अली के बरी होने के फैसले के खिलाफ अपील को मंजूरी देते हुए और उसे दोषी ठहराते हुए ये बातें कहीं. यह मामला उन आरोपों से जुड़ा था जिनमें कहा गया था कि साजिद अली ने बार-बार एक युवती का पीछा किया, यौन टिप्पणी की और अनुचित तरीके से छुआ.
हाई कोर्ट ने बचाव पक्ष की उस कोशिश की कड़ी आलोचना की, जिसमें महिला के कपड़ों (जींस पहनना भी शामिल) को कथित अपराध से जोड़ने की कोशिश की गई थी. जिरह के दौरान महिला ने कहा था कि वह आम तौर पर ‘सामान्य जींस और टॉप’ पहनती है और माना कि इलाके के कुछ लोगों ने उसके पहनावे पर आपत्ति जताई थी.
जस्टिस सुधा ने उसके कपड़ों के बारे में सवाल जवाब को पूरी तरह से अप्रासंगिक और अनुचित बताया और कहा कि ऐसा लगता है कि इसका मकसद महिला को शर्मिंदा करना, अपमानित करना और उसके चरित्र पर नैतिक सवाल उठाना था.
अदालत ने कहा कि कोई लड़की या महिला क्या पहनती है, यह उसकी निजी पसंद का मामला है. न तो उसके पड़ोसियों, न समाज, न आरोपी और न ही अदालत में पेश होने वाले वकील को उसके कपड़ों के बारे में बताने या तय करने का कोई अधिकार है. इससे उनका कोई लेना-देना नहीं है.
फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि महिला का पहनावा न तो उसकी गरिमा को कम करता है और न ही उसके खिलाफ गैर-कानूनी हरकत के लिए कोई बहाना या माफी देता है. इसमें यह भी कहा गया कि महिलाओं को कैसे कपड़े पहनने चाहिए, इस बारे में दकियानूसी सोच की न्यायिक कार्यवाही में कोई जगह नहीं है और इसका इस्तेमाल चरित्र हनन या पीड़िता को दोषी ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता.
अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि महिला की जींस युवा लड़कों को बिगाड़ सकती है. अदालत ने कहा कि सही तरीका यह है कि बच्चों को अपना व्यवहार नियंत्रित करना, निजी सीमाओं का सम्मान करना और दूसरों के साथ सम्मान से पेश आना सिखाया जाए, न कि यह तय किया जाए कि लड़कियां और महिलाएं क्या पहनें.
इस फैसले में धर्म और स्थानीय रीति-रिवाजों का हवाला देने की कोशिशों को भी खारिज कर दिया गया. सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया था कि हर इलाके की अपनी परंपराएं और रीति-रिवाज होते हैं जिनका पालन वहां के निवासियों को करना होता है.
जस्टिस सुधा ने इस दलील को पूरी तरह से अस्वीकार्य करार दिया और कहा कि महिला या निवासियों के धर्म और उसके पहनावे का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है.
अदालत ने कहा कि गैर-कानूनी व्यवहार को सही ठहराने या किसी महिला की निजी पसंद पर पाबंदियां लगाने के लिए न तो धर्म और न ही स्थानीय रीति-रिवाजों का इस्तेमाल किया जा सकता है.
हाई कोर्ट ने साजिद अली और स्थानीय निवासियों द्वारा महिला के खिलाफ दर्ज कराई गई कथित शिकायत का भी जिक्र किया. खबरों के मुताबिक, इस शिकायत में उसके परिवार के किसी पुरुष सदस्य के बिना अपनी मां के साथ रहने, ‘आपत्तिजनक कपड़े’ पहनने और इलाके के युवा लड़कों को कथित तौर पर ‘बिगाड़ने’ पर आपत्ति जताई गई थी.
जस्टिस सुधा ने कहा कि उन्हें ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं मिला जिसके तहत महिला के रहने के तरीके या कपड़ों को Police कार्रवाई के लायक अपराध माना जा सके.
सबूतों की जांच के बाद, अदालत ने पाया कि आरोपी द्वारा बिना सहमति के शारीरिक संपर्क और पीछा करने (स्टॉकिंग) के बारे में महिला का बयान एक जैसा और विश्वसनीय था. अदालत ने माना कि अली द्वारा अनुचित छूना और की गई टिप्पणियां अपराध हैं और उसे यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराया.
जस्टिस सुधा ने निर्देश दिया कि किसी महिला के पहनावे, चरित्र, जीवनशैली, धर्म या निजी पसंद से जुड़े सवाल तब तक नहीं पूछे जाने चाहिए, जब तक कि वे मामले से जुड़े किसी मुद्दे के लिए बहुत जरूरी न हों.
अली को सजा के सवाल पर सुनवाई के लिए Wednesday को हाईकोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया गया है.
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एमएस/डीकेपी
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