
संभाजीनगर, 24 जून . Prime Minister Narendra Modi ने हाल ही में फ्रांस और स्लोवाकिया का दौरा किया. इस दौरान पीएम मोदी ने स्लोवाकिया के President पीटर पेलेग्रिनी को हाथ से बने थेवा मोटिफ कफलिंक, हिमरू सिल्क टाई और पॉकेट स्क्वायर और पीतल का डोकरा एंटीलोप सेट भेंट किया. हिमरू कला से जुड़े इमरान कुरैशी ने कहा कि पीएम मोदी ने छत्रपति संभाजीनगर की ऐतिहासिक हिमरू कला को वैश्विक पहचान दिलाई है.
हिमरू फैक्टरी के संचालक इमरान कुरैशी ने समाचार एजेंसी से बातचीत में कहा कि आज हिमरू बहुत आगे निकल चुका है, हमें बहुत खुशी और गर्व है.
इमरान कुरैशी ने बताया, “हमारे देश के लिए गर्व की बात है कि Prime Minister Narendra Modi ने स्लोवाकिया के President को हिमरू का तोहफा दिया.
उन्होंने हिमरू बुनाई की परंपरा को India की महत्वपूर्ण धरोहर बताते हुए कहा, “हिमरू हाथ से बनाया जाता है. यह शुद्ध हैंडलूम है, जिसमें कोई मशीनरी या जैक्वार्ड मशीन नहीं लगती. दो लोग मिलकर 2 मीटर की शॉल तैयार करते हैं.
इसकी खासियत बताते हुए उन्होंने कहा, “इसमें बहुत पुराने पैटर्न होते हैं, जिनमें धागों के अंदर नक्शा छिपा रहता है. ज्यादातर डिजाइन फारसी मोटिफ्स पर आधारित हैं. मेरे पिता ने हिमरू में अजंता के 3-4 डिजाइन शामिल किए. तोते, फूल, गुलाब, बेल, और मुगल-ए-आजम जैसे प्रसिद्ध पैटर्न भी हैं, जिसे दिवंगत फिल्म Actor दिलीप कुमार ने बनवाया था.
उन्होंने अनोखी तकनीक और चुनौती का जिक्र करते हुए कहा कि 1 मीटर हाथ से बुना हुआ हिमरू कपड़ा बनाने में 6-7 दिन लगते हैं क्योंकि यह पूरी तरह से मैनुअल प्रक्रिया है.
इमरान कुरैशी ने दावा किया कि मेरे पास जो तकनीक है, वह न सिर्फ India बल्कि पूरी दुनिया में किसी और के पास नहीं है. अगर कोई इसे मशीन पर बनाएगा तो वह नकली होगा.
हिमरू कला के इतिहास के बारे में उन्होंने कहा कि हिमरू की शुरुआत खिमखाप से हुई, जो परसिया से आया था. उनके पूर्वज मुहम्मद हुसैन और मुहम्मद याकूब कुरैशी 14वीं शताब्दी में मुहम्मद बिन तुगलक के साथ दिल्ली आए थे. खिमखाप शुरू में शाही परिवारों के लिए शुद्ध रेशम, साटन, मखमल, सोना और चांदी से बनता था. बाद में आम लोगों के लिए सूती और रेशम में तैयार किया जाने लगा और इसका नाम ‘हिमरू’ पड़ा.
हिमरू फारसी शब्द है, जिसका अर्थ है ‘मेरे जैसा’ यानी खिमखाप की नकल. उन्होंने बताया कि उनके पास अभी भी 500 से ज्यादा मूल खिमखाप पैटर्न मौजूद हैं.
इमरान कुरैशी ने कहा कि वे इस विरासत को जिंदा रखने के लिए ट्रेनिंग दे रहे हैं. अखबारों में विज्ञापन देकर महिलाओं को ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि हिमरू की यह अनोखी बुनाई आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सके.
इमरान कुरैशी ने अपनी इस प्राचीन कला पर गर्व जताते हुए कहा कि हिमरू के असली डिजाइन और बुनाई की तकनीक दुनिया में कहीं और उपलब्ध नहीं है.
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डीकेएम/डीकेपी
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