70 साल की ‘चूहा-मुक्त’ पहचान पर संकट! कनाडा के अल्बर्टा में ‘रैट पेट्रोल’ ने संभाला मोर्चा

अल्बर्टा, 26 सितंबर . कनाडा के अल्बर्टा को दुनिया में ‘रैट-फ्री प्रोविंस’ (प्रांत) के तौर पर जाना जाता है. एक ऐसी पहचान, जिस पर लोगों को दशकों से गर्व रहा है. लेकिन एक मामले ने अचानक लोगों को जोर का झटका दिया है. यहां एक मरा हुआ चूहा मिलने से सब सकते में है.

अल्बर्टा को दुनिया के उन गिने-चुने आबादी वाले इलाकों में माना जाता है, जहां चूहों की स्थायी आबादी नहीं रही. Thursday (24 सितंबर 2026) को इसमें डेंट लगा, जब प्रांत के बोउडेन शहर में एक मरा हुआ चूहा मिला. इसके बाद प्रशासन ने अपनी ‘रैट पेट्रोल’ टीम को सक्रिय कर दिया है.

बोउडेन प्रशासन ने Thursday को चूहे के मिलने की जानकारी सार्वजनिक करते हुए लोगों से सतर्क रहने और चूहे या उसके निशान दिखाई देने पर तुरंत सूचना देने को कहा. यह नहीं बताया गया कि चूहा शहर में वास्तव में किस स्थान पर मिला था. इसके बाद प्रांत की ‘रैट पेट्रोल’ ने मामले की जांच शुरू कर दी है.

अल्बर्टा के लिए यह मामला इसलिए खास है क्योंकि यहां चूहों को लेकर लड़ाई कोई नई बात नहीं है. प्रांत में 1950 से बाकायदा ‘रैट पेट्रोल प्रोग्राम’ चल रहा है. पिछले सात दशकों से प्रशासन ने चूहों को यहां स्थायी रूप से बसने से रोकने के लिए लगातार निगरानी और नियंत्रण की व्यवस्था बनाए रखी है.

अल्बर्टा Government के मुताबिक, प्रांत में चूहों की मौजूदगी का मतलब यह नहीं है कि वहां कभी कोई चूहा पहुंच ही नहीं सकता. ‘रैट फ्री’ का अर्थ यह है कि यहां चूहों की कोई स्थायी आबादी नहीं है और उन्हें यहां अपनी आबादी स्थापित करने की अनुमति नहीं दी जाती. अधिकारियों को हर साल चूहों की मौजूदगी की सैकड़ों शिकायतें मिलती हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर मामले चूहों के बजाय मस्करेट, वोल या खेतों में पाए जाने वाले दूसरे छोटे जीवों के निकलते हैं.

अल्बर्टा की भौगोलिक स्थिति भी इस काम में मदद करती रही है. प्रांत का बड़ा हिस्सा पहाड़ों और बोरियल फोरेस्ट (हिम वन) से घिरा है. अधिकारियों का कहना है कि नॉर्वेयन रैट यानी आम भूरे चूहे के लिए विशाल प्राकृतिक क्षेत्र में जीवित रहना और सर्दियों के दौरान खुले खेती वाले इलाकों में टिके रहना मुश्किल होता है.

अल्बर्टा की ‘चूहा-मुक्त’ पहचान केवल प्रकृति की देन नहीं है. इसके पीछे सात दशक से ज्यादा समय से चल रहा प्रशासनिक और सामुदायिक प्रयास भी है.

1950 के दशक में अधिकारियों को आशंका थी कि पड़ोसी प्रांत सस्केचेवान की ओर से चूहे अल्बर्टा में प्रवेश कर सकते हैं. इसके बाद पूर्वी सीमा पर एक विशेष ‘रैट कंट्रोल जोन’ बनाया गया. यह क्षेत्र करीब 600 किलोमीटर लंबा और 30 किलोमीटर चौड़ा था. यहां चूहों की आवाजाही पर नजर रखी जाती थी.

इतिहास में चूहों के खिलाफ चलाए गए इस अभियान का पैमाना भी कम नहीं था. जून 1952 से जुलाई 1953 के बीच करीब 1,40,000 पाउंड आर्सेनिक ट्राइऑक्साइड पाउडर का इस्तेमाल 2,700 खेतों की 8,000 इमारतों में चूहों को नियंत्रित करने के लिए किया गया था. बाद में जागरूकता अभियान चलाए गए और लोगों को चूहों की पहचान करने तथा उनके बारे में अधिकारियों को सूचना देने के लिए प्रोत्साहित किया गया.

आज भी अल्बर्टा में चूहों की सूचना देने के लिए विशेष फोन लाइन और ईमेल व्यवस्था है. यानी यहां किसी चूहे का दिखाई देना सामान्य घटना नहीं माना जाता, बल्कि उसे संभावित खतरे के रूप में देखा जाता है.

दिलचस्प बात यह है कि अल्बर्टा में चूहों की संख्या को नियंत्रित करने की यह व्यवस्था अब भी काफी प्रभावी मानी जाती है. लेकिन हाल के वर्षों में अधिकारियों के सामने नई चुनौतियां भी हैं. लोगों की यात्रा बढ़ने के कारण चूहों के दूसरे इलाकों से अनजाने में यहां पहुंचने की संभावना बढ़ी है. इसके अलावा शहरों के फैलाव से कचरे और भोजन की उपलब्धता जैसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं, जो चूहों के लिए अनुकूल होती हैं.

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केआर/